Sahityayan

Tuesday, 11 September 2018

अंजलि गुप्ता सफर की गजलें

 अम्बाला ( हरियाणा , भारत ) की उदीयमान कवयित्री अंजलि गुप्ता सिफ़र गजलें , लघुकथाएं 
लिखती हैं । उन की गजलों का संग्रह छपने वाला है । वे गणित की अध्यापिका हैं । उन के 
उज्ज्वल भविष्य की कामना  है । 
सुधेश 


 अम्बाला ( हरियाणा , भारत ) की उदीयमान कवयित्री अंजलि गुप्ता सिफ़र गजलें , लघुकथाएं 
लिखती हैं । उन की गजलों का संग्रह छपने वाला है । वे गणित की अध्यापिका हैं । उन के 
उज्ज्वल भविष्य की कामना  है । 
सुधेश 


                  गजलें 

साथ उनके उजाले गए
जब वहां जाने वाले गए

ख़ाक में जो बचे थे निशां
पानियों के हवाले गए

जो पड़े थे सफ़र में यहां
उस जहां तक वो छाले गए

सब परिंदे उड़े एक दिन
चाहे जितना भी पाले गए

रोज़ इक मौत मरते रहे
और जीने को टाले गए

मौत आई तो इक पल न हम
ज़िन्दगी से सम्भाले गए

रह गया सब यहीं पर 'सिफ़र 
संग तिजोरी न ताले गए । 
2.

मेरे ग़म झांकते हैं खिड़कियों से
कहां महफूज़ है दिल सांकलों से

हमारी रोशनी है दम से अपने
चमकना सीखा हमने जुगनुओं से

कभी मिलने की भी सूरत निकालो
बहुत बहलाया तुमने हिचकियों से

बिकेगा मुफ़्त में ईमान इक दिन
लगे डर इसकी गिरती कीमतों से

न मेरा साथ छोड़ेंगी कभी ये
है अपनी दोस्ती तन्हाइयों से

ज़माने भर की दौलत भी लगे कम
जो निकले पैर बाहर चादरों से

नहीं दरिया 'सिफ़र' सागर से मिलता
अगर डरता ही रहता है पत्थरों से ।


                 भुला कर अपनों को जीने की फ़ितरत मार डालेगी
किसी दिन हमको ख़ुद अपनी ज़रूरत मार डालेगी

न दिन में चैन रातों को भी नींद आती नहीं हमको
तुम्हारे इश्क़ में आई ये नौबत मार डालेगी

मेरी सांसों में घुलती जा रही थी उनकी भी सांसें
मिली उनसे जो ख़्वाबों में वो क़ुरबत मार डालेगी

बना कर आज पैसे को ख़ुदा तू पूजता इसको
तुझे कागज़ की तेरी ये इबादत मार डालेगी

तुम्हें जैसे ही देखे तो धड़कना भूल जाता है
मुझे मेरे ही दिल की ये बग़ावत मार डालेगी

दिया क्या तुमने हमको और मिला हमको भी तुमसे क्या
मुहब्बत में दिलों की ये तिजारत मार डालेगी


न मेरा नाम लेना तुम न मुझको याद ही करना
'सिफ़र' को संगदिल की ये हिदायत मार डालेगी । 

4.

‪1‬

किसी का दिल किसी की जान हो जाना
किसी के ख़्वाबों का सामान हो जाना

किसी से प्यार जब करना तो कुछ ऐसे 
उसी का रात दिन अरमान हो जाना

मिसालें दे तुम्हारी भी ज़माना ये
किसी के इश्क़ का यूं मान हो जाना

न वादा तोड़ना करके किसी से तुम
निभाने वालों की पहचान हो जाना

तेरा हो साथ तो दुश्वारियों का भी
बहुत आसान है आसान हो जाना

हमारी याद जब आये तो यूं करना
सिमटते अश्कों की मुस्कान हो जाना

कहीं रुसवा न हो जाए सरे महफ़िल
'सिफ़र' को देखकर अंजान हो जाना


5.



जो ख़्वाब देखे सहर में मैंने वो शाम से पहले ढल चुके हैं 
मैं अपने अश्कों को रोकूँ कैसे वो बन के तूफान चल चुके हैं 

न दिल से मुझको कभी भुलाना करीब आकर न दूर जाना 
तेरी छुअन की तपिश से मेरे ग़मों के साए पिघल चुके हैं 

किया था इकरार जो नज़र ने वो आ न पाया कभी ज़ुबां पे  
हो क़ाश किस्मत में उनकी खुलना जो ख़त तेरे नाम डल चुके हैं 

ढली है फिर आज शाम कोई है , है तन्हा शबनम कहीं पे रोई 
कभी था हाथों में हाथ तेरा, हंसी वो मंज़र बदल चुके हैं 

सुनाएं क्या अपनी हम कहानी ,दिखाएं क्या दर्द की निशानी 
लिखे थे जिन पर फ़साने दिल के, तमाम कागज़ वो जल चुके हैं 

न एतबार अब रहा किसी पर, है तीरगी हावी रोशनी पर  
'सिफ़र' करें बात कांटों की क्या ,चमन को तो गुल ही छल चुके हैं
अंजलि गुप्ता सिफ़र 








                  गजलें 

साथ उनके उजाले गए
जब वहां जाने वाले गए

ख़ाक में जो बचे थे निशां
पानियों के हवाले गए

जो पड़े थे सफ़र में यहां
उस जहां तक वो छाले गए

सब परिंदे उड़े एक दिन
चाहे जितना भी पाले गए

रोज़ इक मौत मरते रहे
और जीने को टाले गए

मौत आई तो इक पल न हम
ज़िन्दगी से सम्भाले गए

रह गया सब यहीं पर 'सिफ़र 
संग तिजोरी न ताले गए । 
2.

मेरे ग़म झांकते हैं खिड़कियों से
कहां महफूज़ है दिल सांकलों से

हमारी रोशनी है दम से अपने
चमकना सीखा हमने जुगनुओं से

कभी मिलने की भी सूरत निकालो
बहुत बहलाया तुमने हिचकियों से

बिकेगा मुफ़्त में ईमान इक दिन
लगे डर इसकी गिरती कीमतों से

न मेरा साथ छोड़ेंगी कभी ये
है अपनी दोस्ती तन्हाइयों से

ज़माने भर की दौलत भी लगे कम
जो निकले पैर बाहर चादरों से

नहीं दरिया 'सिफ़र' सागर से मिलता
अगर डरता ही रहता है पत्थरों से ।


                 भुला कर अपनों को जीने की फ़ितरत मार डालेगी
किसी दिन हमको ख़ुद अपनी ज़रूरत मार डालेगी

न दिन में चैन रातों को भी नींद आती नहीं हमको
तुम्हारे इश्क़ में आई ये नौबत मार डालेगी

मेरी सांसों में घुलती जा रही थी उनकी भी सांसें
मिली उनसे जो ख़्वाबों में वो क़ुरबत मार डालेगी

बना कर आज पैसे को ख़ुदा तू पूजता इसको
तुझे कागज़ की तेरी ये इबादत मार डालेगी

तुम्हें जैसे ही देखे तो धड़कना भूल जाता है
मुझे मेरे ही दिल की ये बग़ावत मार डालेगी

दिया क्या तुमने हमको और मिला हमको भी तुमसे क्या
मुहब्बत में दिलों की ये तिजारत मार डालेगी


न मेरा नाम लेना तुम न मुझको याद ही करना
'सिफ़र' को संगदिल की ये हिदायत मार डालेगी । 

4.

‪1‬

किसी का दिल किसी की जान हो जाना
किसी के ख़्वाबों का सामान हो जाना

किसी से प्यार जब करना तो कुछ ऐसे 
उसी का रात दिन अरमान हो जाना

मिसालें दे तुम्हारी भी ज़माना ये
किसी के इश्क़ का यूं मान हो जाना

न वादा तोड़ना करके किसी से तुम
निभाने वालों की पहचान हो जाना

तेरा हो साथ तो दुश्वारियों का भी
बहुत आसान है आसान हो जाना

हमारी याद जब आये तो यूं करना
सिमटते अश्कों की मुस्कान हो जाना

कहीं रुसवा न हो जाए सरे महफ़िल
'सिफ़र' को देखकर अंजान हो जाना


5.



जो ख़्वाब देखे सहर में मैंने वो शाम से पहले ढल चुके हैं 
मैं अपने अश्कों को रोकूँ कैसे वो बन के तूफान चल चुके हैं 

न दिल से मुझको कभी भुलाना करीब आकर न दूर जाना 
तेरी छुअन की तपिश से मेरे ग़मों के साए पिघल चुके हैं 

किया था इकरार जो नज़र ने वो आ न पाया कभी ज़ुबां पे  
हो क़ाश किस्मत में उनकी खुलना जो ख़त तेरे नाम डल चुके हैं 

ढली है फिर आज शाम कोई है , है तन्हा शबनम कहीं पे रोई 
कभी था हाथों में हाथ तेरा, हंसी वो मंज़र बदल चुके हैं 

सुनाएं क्या अपनी हम कहानी ,दिखाएं क्या दर्द की निशानी 
लिखे थे जिन पर फ़साने दिल के, तमाम कागज़ वो जल चुके हैं 

न एतबार अब रहा किसी पर, है तीरगी हावी रोशनी पर  
'सिफ़र' करें बात कांटों की क्या ,चमन को तो गुल ही छल चुके हैं
अंजलि गुप्ता सिफ़र