Sahityayan

Monday, 30 January 2017

रंजना जायसवाल की कविताएँ

व्यक्तिगत परिचय 
जन्म  ०३ अगस्त को पूर्वी उत्तर-प्रदेश के पडरौना जिले में |
आरम्भिक शिक्षा पडरौना में |
उच्च-शिक्षा गोरखपुर विश्वविद्यालय से “प्रेमचन्द का साहित्य और नारी-जागरण”’ विषय पर पी-एच.डी |
प्रकाशन आलोचना ,हंस ,वाक् ,नया ज्ञानोदय,समकालीन भारतीय साहित्य,वसुधा,वागर्थ,संवेद सहित राष्ट्रीय-स्तर की सभी पत्रिकाओं तथा जनसत्ता ,राष्ट्रीय सहारा,दैनिक जागरण,हिंदुस्तान इत्यादि पत्रों के राष्ट्रीय,साहित्यिक परिशिष्ठों पर ससम्मान कविता,कहानी ,लेख व समीक्षाएँ प्रकाशित |
अन्य गतिविधियाँ-साहित्य के अलावा स्त्री-मुक्ति आंदोलनों तथा जन-आंदोलनों में सक्रिय भागेदारी |२००० से साहित्यिक संस्था ‘सृजन’के मध्यम से निरंतर साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन | साथ में अध्यापन भी |
प्रकाशित कृतियाँ कविता-संग्रह -मछलियाँ देखती हैं सपने [२००२],दुःख-पतंग [२००७],जिंदगी के कागज पर [२००९],माया नहीं मनुष्य [२००९],जब मैं स्त्री हूँ [२००९] सिर्फ कागज पर नहीं[२०१२]|क्रांति है प्रेम [2015]
कहानी-संग्रह तुम्हें कुछ कहना है भर्तृहरि [२०१०],औरत के लिए [२०१३]
लेख-संग्रह स्त्री और सेंसेक्स [२०११]
उपन्यास -..और मेघ बरसते रहे ..[२०१३]
सम्मान अ .भा .अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार[मध्य-प्रदेश], भारतीय दलित साहित्य अकादमी पुरस्कार [गोंडा ],स्पेनिन साहित्य गौरव सम्मान [रांची ,झारखंड]|विजय देव नारायण साही कविता सम्मान [लखनऊ,हिंदी संस्थान ]भिखारी ठाकुर सम्मान [सीवान,बिहार ]
संपर्क सृजन-ई.डब्ल्यू.एस-२१०,राप्ती-नगर-चतुर्थ-चरण,चरगाँवा,गोरखपुर,पिन-२७३४०९ |मोबाइल-०९४५१८१४९

घास -चार कविताएं 

हरी घास 
थोड़ा सा हरापन मुझे भी दे दो हरी घास
सूख रहा है मन दुनियावी तपिश से तुम जानती हो विपरीत परिस्थितियों में भी जीने की कला नष्ट करने की कोशिशों में भी बचाए रखना अपना अस्तित्व कुचले जाने के बाद भी ना छोडना अपनी कोमलता और धरती पर अपनी पकड़
मुझे भी यह कला सिखला दो हरी घास |
घास के फूल 
घास में खिले हुए हैं
नन्हें कोमल
टीम -टीम करते
लाल पीले बैंगनी
कई रंगों के फूल
घास हरी -भरी पूरी है ख़ुशी से
देख -देखकर
चिढ रहे हैं
नाटे मझोले लम्बे
फूल वाले सभी पेड़ -पौधे
पीला हो रहा है कनेर
पलाश लाल
गुलाब भी प्रसन्न नही है
जबकि जानते हैं
छिले जाने ..रौंदे जाने काटे जाने
या जानवरों का आहार बनने की
घास के फूलों की नियति
जानते हैं
कवि और प्रेमियों के सिवा
देखता तक नहीं कोई इन्हें
लोगों की संभ्रांत पसंद में भी
शामिल नही हैं ये दलित फूल
देवताओं पर भी नही चढ़ाये जाते
फिर भी इनके खिलने से
परेशान हैं
नाटे -मंझोले -लम्बे
फूल वाले सभी पेड़ -पौधे |

बावली घास
नख से शिख तक बादलों के प्रेम में डूबी है घास ना तो उतराती है ना इतराती है विस्मृत कर बैठी है अपना अलग 'अस्तित्व'
देखकर उसे 
हँस रहे हैं बड़े वृक्ष
-
अरी, हमें भी 
छूता है प्रेम ताजा हो लेते हैं कुछ क्षण तुम्हारी तरह भूलते नहीं अपना 'स्व'पेड़ क्या जाने प्रेम को जज्ब कर
स्वयं प्रेम बन जाना यह तो जानती है सिर्फ बावली घास |

बेटी है कि माँ है घास
माँ धरती की नंगी देह को हरे मखमल से
ढांक रही है बेटी घास हरी हो गयी है धरती की सूखी देह बेटी के शीतल,सुखद,कोमल स्पर्श से जानती है घास कि माँ पर आधिपत्य है जिनका नहीं भाता उन्हें माँ-बेटी का इतना प्यार
वे कभी भी सोहवाकर,चरवाकर
या मशीन चलवाकर खींच लेंगे उनके बीच का सारा मखमल वह सूख जायेगी माँ से बिछड़कर
फिर भी मचल-मचलकर चिपक रही है माँ की छाती से घास माँ से ही सिखा है उसने माँ बनना उसकी स्नेहिल गोद में भी खेलते हैं बच्चे बिना चोट खाए युवा प्रेम करते हैं निश्चिंत बूढ़े दुःख-दर्द बाँटते हैं |
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Thursday, 15 September 2016

शुभदा वाजपेयी की रचनाएँ

    कानपुर विश्वविद्यालय की स्नातक श्रीमती शुभदा वाजपेयी हिन्दी की श्रेष्ठ गीतकार 
   ग़ज़लकार दोहाकार और मुक्तक लेखिका हैं । 
भारतीय साहित्य उत्थान समिति दिल्ली द्वारा *गगन स्वर  सेवी सम्मान और 
हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी आदि अनेक संस्थाओं से उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त 
हो चुके हैं। 
आकाश वाणी पर और  अनेक काव्य मंचों पर भी वे कविता पाठ कर चुकी हैं ।
रेडियो  द्वारका ( दिल्ली  )  से उन के मधुर गीत उन के स्वर में प्रसारित हो चुके  
हैं । उन की रचनाएँ सहयोगी काव्य संकलन और अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित 
हुईं । शुभदा जी एक कुशल गृहिणी हैं । 
उन के कुछ गीत और गजलें यहाँ प्रस्तुत हैं । 
    ----  सुधेश 

       गीत 
जीवन एक अभियान हो गया ।
जितनी अड़चन मिली राह में,
सफ़र और आसान हो गया।
सोच रहे थे हम मन ही मन
पानी ही अपना जीवन धन
ऐसे सूखे ताल तलैया तन,
मन रेगिस्तान हो गया।
कौन है अपना कौन पराया
ये पागल मन समझ ना पाया
जब से ठुकराया अपनों ने
भले,बुरे का ज्ञान हो गया।
तिनका, तिनका माया जोड़ी
बीती बहुत रही अब थोड़ी
ऐसे रंगी श्याम के रंग में
केसरिया परिधान हो गया।
सबकी अपनी अलग कतारें
आँगन बीच खिंची दीवारें
दरवाज़े का बूढा बरगद
झुक कर तीरकमान हो गया।
--- शुभदा वाजपेयी 

आज गगन में चाँद सितारे रात चांदनी आई है,
क्या बतलाएं प्रियतम फिर से याद तुम्हारी आई है।
आँखों से आंसू बहते हैं,नयन तुम्हें ही खोज रहे,
जब से तुम बिछुड़े हो साजन, राहें तकते रोज रहे,
यूँ लगता है तुमने मेरी सुधि बिलकुल ही बिसराई है।
जब जब सावन की ऋतु आती,मन मेरा हर्षाता है
लगता है बादल की ओट से चेहरा कोई बुलाता है
सब खुश हैं बस कली हमारे ही मन की मुरझाई है।
आस यही उर को मेरे कितनी जल्दी तुम आ जाओ
कुछ तुम मेरी व्यथा सुनो और अपनी मुझे सुना जाओ
रिमझिम बरसें नभ से बूंदें आँख मेरी भर आई है !
शुभदा बाजपेयी
           गजलें 

जिन्हें अपना समझ कर हम सभी दुखड़े बताते हैं
वही  बन कर  सितमगर  बिजलियाँ  दिल पे गिराते हैं ।
भला करने चले हम तो ,बुराई मिल सदा जाती
सुनाएं हाल दिल अपना किसे,  नहीं हम जान पाते हैं 
भले ही राह मुश्किल हो,हमे चलना ज़रूरी है,
निराले बाग दिखते हैं,जहाँ हम गुल सजाते हैं।
बहुत देखा सभी रिश्ते , वफ़ा से कुछ नहीं हासिल
सिला हमको मिला ऐसा ,नही हम भूल पाते हैं।
हमारी पीर को जानो हमे अपना  समझ कर तुम,
हमारे अपने ही  आकर , किनारे पर डुबाते हैं।
कसक कर दिल ये कहता है, न बारिश आँख की रूकती
दर्द अपने ही दिल का हम , सदा गाकर सुनाते हैं।
उदासी का यही आलम , सहन करना सदा 'शुभदा',
नही हम जानते फिर भी ,उन्हें ही सब बताते हैं।
शुभदा वाजपेयी 

पृष्ठ पलट देखूं जीवन के क्या खोया और क्या पाया
पाना सब चाहा मैंने पर हाथ नहीं कुछ भी आया।
कुछ जीवन की यादें हैं जिनके दम अब तक ज़िन्दा हूँ
जीवन की मुश्किल घड़ियों में जरा नहीं दिल घबराया।
सूख गया जब आशाओं का सब पानी चिंगारी से
तब जाकर मनहूस घडी में अब ये बादल भी छाया।
बचपन बीता गई जवानी अब जब ठूंठ सी सांसें हैं
बे-गैरत इंसान चला यह बतलाने सब है माया।
नीरस है जीवन का मेला नहीं है कोई रंग उमंग
आस का दीपक बुझा दिया है फर्क नहीं कोई आया।
'शुभदा' कौन सुने अब धुन को रंगमहल सब सूने हैं
किसने छेडी तान सुरीली किसने गीत मधुर गाया।
शुभदा वाजपेई

छत्तरपुर एक्सटेंशन दिल्ली

Monday, 25 July 2016

मेरे मुक्तक

     मेरे मुक्तक 

हरे मैदान  में कोई पहाड़ में हैं 
उस का राग भोपाली वो दहाड़ में है 
ख़ुशामद से या धमका चमका कर ही 
सब अपनी अपनी किसी जुगाड़ में हैं । 

वो गीत गाता कोई गजल कहता है 
वो ऊँची कुर्सी पर नशे में रहता है 
कोई सिंहासन हथियाने की जल्दी में 
हर दिन नंगे  पाँव दौड़ता रहता है ।

एक किसी पुरस्कार का प्यारा है 
दिन में गगन में देखता तारा है
दूजा बस लौटाने की जल्दी में 
लगता है पुरस्कार  का मारा है । 

न जान पायेगा जानने वाला 
शायद जाने नहिं जाननेवाला 
तुम तो  सब को ही जानते होगे 
पर कौन तुम्हें पहचानने वाला ।।
दिलों में प्यार की रोशनी हो 
बाहर भी तब तो रोशनी हो 
दिवाली का दीपक कहता है 
भीतर औ बाहर  रोशनी हो ।

ये मिट्टी दिये आग से निकले हैं 
जल तप कर ये अपना रँग बदले हैं 
इन में बस थोड़ा सा स्नेह  डाल दो,
फ़िर देखो बनते प्रकाश पुतले हैं ।


मन्दिर में रक्खा है धन 
बाहर कुछ माँगें निर्धन 
देखो प्रसाद भी बिकता
मुफ़्त नहीं कुछ पाता जन ।

दीवाली तब दीवाली है कोई संग साथ हो
दोस्त पड़ौसी हों सुख दु:ख के साथी भी साथ हों 
अकेले में क्या जीवन क्या कोई उत्सव त्योहार 
मुख में मिष्टान्न और होंठों पर प्रिय मधुर बात हो ।

आ गई अब कैसी घडी है 
हरेक पल परीक्षा घडी है 
अब कौन सुने किसी का दर्द 
सब को यहाँ अपनी पड़ी है  । 

नारि जाति रक्षा करे संसार की 
पहले निज घर की फिर संसार की 
मेरी चिन्ता केवल एक यही है 
न मिलती  होगी फुर्सत सिंगार  की ।

पुरुष वर्ष तो रोज ही फिर यह कैसा आज 
वर्ष सभी के एक दिन चलो तुम्हारा आज ।
अगर नारियाँ शुभ कहें तो मानो शुभ कर्म 
वरना पुरुषसमाज के  अक्सर काले काज ।


ज़िन्दगी है ज़िन्दगी 
मरो खपो तो ज़िन्दगी 
चैन से रहना अगर 
करते रहो बन्दगी ।

मौसम बदल गया है दिल तो मगर वही है 
तन को न लगे सर्दी मन की खबर नहीं है 
कुछ चाय शाय ले लो जिस को कहें गरम सी 
जो हाल है उधर का लगभग इधर वही है ।

लोकार्पण से अमरत्व मिला है किस किस को 
फिर भी उस में लीन यहाँ देखा इस उस को 
लोकार्पण का धन्धा उसका धन्धा है 
वही अनाड़ी न मिला है वह जिस जिस को ।

घडी से समय है समय की घडी है 
समय अब कहाँ हाथ में जब घडी है । 
अब साँस लेने की फुर्सत किसे है 
तुम्हें बात करने को जल्दी पड़ी है ।

जमाना तो अभी तक आप का है 
मेरा है और  तुम्हारे बाप का है 
जीवन में जो कुछ भी नहीं करते 
उन को जमाना मगर शाप का है ।

बीत गया जो वक्त न वापस आता है 
वही रुलाता फिर वही  हँसा जाता है 
जीवन तो नदिया की बहती धारा है 
जिस में ही सारा  वक्त बहा जाता है ।

खादी वस्त्र नहीं है विचार है 
छिपा ग़रीब के प्रति चिर प्यार है 
तन ढकना पर देशी कपड़े से 
यह स्वदेशी का उच्च विचार है ।

जन्म जन्म का साथ है दोनों का 
एक हाथ में हाथ है दोनों का 
जन्म जन्म किस ने देखा है यहां 
जन्म सफल यदि साथ है दोनों का ।

बडी देर कर दी उस ने आते आते 
अब आ ही गया किन्तु वह आते आते 
हमें उस का आना यों अच्छा लगा है
वह नहीं आता तो हम मर तो न जाते ।

सपने उम्र भर कैसे रहेंगे 
आज हैं नहीं कल को रहेंगे 
नयन यदि स्वप्न से ख़ाली ख़ाली 
किस की याद में वे फिर बहेंगे ।

समय समय की बात है प्यारे 
समय के रंग होते अनियारे 
आज देखते नहीं मुड़ कर भी 
कभी यार थे हम भी तुम्हारे ।

इन की नींद नहीं टूटेगी चाहे जितने ढोल बजाओ 
उछलो कूदो नाचो चाहे तुम  मीठे मीठे गीत सुनाओ
कुम्भकर्ण के नाती हैं ये सत्ता मद में चूर पड़े हैं
ये तब ही जागेंगे जब इन की कुर्सी से इन्हें हटाओ ।


हर दिन हो नव वर्ष सा 
मिले रोज नव हर्ष सा 
महनत कर मिलता यहाँ 
विमल नया उत्कर्ष सा ।

इन की विपदा कौन कहे 
सभी देख कर मौन रहे
जन्म से भूखे पडे हैं 
दुख सारे चुपचाप सहे । 

बात बात में नाराज़गी की बात क्यों है 
धूप से खिलते दिन में काली रात क्यों हैं? 
अपनों से नाराज़गी भी हो जाया करती 
तो इस जिन्दगी में यह अजीब बात क्यों है?


सपने की माया न्यारी है 
माया जो सब को प्यारी है 
और प्यार का ऐसा जादू 
भलों भलों की मति मारी है ।

गण तन्त्र में गण के साथ तन्त्र है 
उस में गुंजित जनता का मन्त्र है 
बीच में मन्त्र का शोर सुनो शोर 
अन्त  में मिलता तन्त्र ही तन्त्र है ।

सांसे लेते तो सब जीते 
हार हार कर भी कुछ जीते 
जीना तो पर जीना उन का 
मर मर कर भी जो हैं जीते ।

काँटेदार पेड है यह जिन्दगी 
भलाई कम अधिक है दरिन्दगी 
मुक़ाबला करो तो जानूँ मर्द 
वरना करो काँटों की बन्दगी ।

भूला भटका हूँ संसार में 
जला भुना जीवन अंगार में 
शीतल  छांव कभी मिले शायद
तेरे निश्छल पावन प्यार में । 

गाँव में पीपल पीपल की छांव 
छांव में पलता यह सारा गाँव 
यह वैसा ही हुआ जैसा सुना था 
हाथी के पाँव में सब का पाँव ।

आज तो वसन्त है 
रंगा सा दिगन्त है
ममता की पीलिमा 
वसन्त ही वसन्त है ।
----  सुधेश 
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारका , सैक्टर १० 
दिल्ली ११००७५ 


Wednesday, 18 May 2016

तरुण प्रकाश के नवगीत

         लखनऊ के उदीयमान कवि तरुण प्रकाश से हाल में परिचय हुआ , पर मैं उन के गीत 
पढ कर मुग्ध हो गया । उन के गीत नूतन विम्बों की लड़ियाँ हैं , उन में नवीन उपमाओं और रूपकों की 
मालाएँ सज रही हैं । कथ्य की विविधता और शिल्प की नवीनता उन के गीतों में भरपूर है । नवगीत के 
इस ज्वलन्त हस्ताक्षर को यहाँ प्रस्तुत कर मुझे अति प्रसन्नता हो रही है । 
उन का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है  ---
श्री मनोज प्रकाश श्रीवास्तव के पुत्र ।
जन्म तिथि :   07.09.1963
संपर्क : C - 3263 राजाजीपुरम, लखनऊ - 226017
सम्प्रति : अधिवक्ता एवं  विधिक परामर्शदाता 
साहित्य कार्य क्षेत्र : 
प्रकाशित रचनायें  : (१) मैं असहमत हूँ (ग़ज़लें) (२) द्वीप  के उस पार   ( आधुनिक कवितायेँ) (३) हवा के खिलाफ (ग़ज़लें) तथा पूरे देश की  अनेकानेक पत्र - पत्रिकाओं में अनेको रचनाओं का समय - समय पर प्रकाशन    

शीघ्र प्रकाश्य : (१) मध्यांतर (कहानी संग्रह) (२) मेरे अन्दर समंदर  बोलता है (ग़ज़लें) (३) लिस्ट योरसेल्फ फॉर सक्सेस (इंग्लिश आर्टिकल्स)



गीत (1)

आओ फिर तालाब में कंकर उछालें। 

अब नहीं हलचल,
न कोई सुगबुगाहट 
अब नहीं पदचाप -
की भी शेष आहट।।

सिर्फ आँखो में -
टंका है मूक विस्मय 
सिर्फ अधरों पर,
सजी है थरथराहट।।

इस अमावस में कोई दीपक जला लें।
आओ फिर तालाब में कंकर उछालें …।

चल, ज़रा बचपन में,
जाकर घूम आयें 
झूम कर बरसात -
में जी भर नहायें।। 

रात-दिन एक दूसरे -
को याद करके 
देर तक फिर -
बेवजह ही मुस्करायें।। 

नाम लिखकर फिर हथेली में छिपा लें। 
आओ फिर तालाब में कंकर उछालें …।

-- तरुण प्रकाश 



गीत (2)


हम समय लिपिबद्ध कर लें। 

चल सहेजे, 
दिन, मिनट, घंटे, महीने,
बंद कर लें बोतलों में। 

अर्थ ढूंढे,
धूप, जल, बादल, हवा का -
नित्य शाश्वत हलचलों में।।

दे सकें उपहार कल को,
स्वयं को प्रतिबद्ध कर लें। 
हम समय लिपिबद्ध कर लें... 

जेब में - 
भर लें गगन, मौसम सुहाने, 
ये समंदर और पर्वत। 

मोड़ कर,
रख लें किताबों में धरा के, 
चाँद को लिक्खे हुए खत।। 

आज बाहुपाश में, 
आकाश को आबद्ध कर लें। 
हम समय लिपिबद्ध कर लें...

बाँध लें- 
मुस्कान, जादू, फूल, खुशबू,
चांदनी की चादरों में। 

टांक लें, 
सौंदर्य, सरगम, गीत, सपने,
रश्मियों की कतरनों में।। 

हम गहन ब्रह्माण्ड के, 
हर मौन को स्वरबद्ध कर लें। 
हम समय लिपिबद्ध कर लें .... 


-- तरुण प्रकाश 





गीत (3)

रात फिर महकी,
सितारे भर गए फिर ताल में। 

जल कलश में ये,
सुनहरी गिन्नियां
उतरा रही हैं। 

पर मछेरों के
सघनतम जाल में,
कब आ रही हैं।।

एक भी तारा हुआ,
कब कैद उनके जाल में।    

रात फिर महकी,
सितारे भर गए फिर ताल में।



टिमटिमाते-
झिलमिलाते,
जुगनुओं का यह नगर सा। 

नीर के अंदर,
निरंतर -
चल रहा किस भांति जलसा। ।  

व्यस्त जुगनू,
हो गए हैं सत्य की पड़ताल में। 

रात फिर महकी,
सितारे भर गए फिर ताल में।



आ लगा, 
कितना सही,
नटखट निशाना दूर का है ।  

ताल के अंदर,
गिरा जा,
थाल मोतीचूर का है ।। 

टंक  गए
कितने सितारे,
फिर सतह के शाल में। 

रात फिर महकी,
सितारे भर गए फिर ताल में।


-- तरुण प्रकाश




गीत (4)


फिर, 
दहकने लग गए,
जंगल पलाशों के। 

आ गया फिर गाँव में,
रस-राग का मौसम। 
देह के अंदर चिटकती,
आग का मौसम। 

फिर,
बहकने लग गए,
क्रम बाहुपाशों के। 

नापने को, प्रीति की,
गहराईंयों के दिन। 
आ गए जिद्दी-हठी,
अंगड़ाइयों के दिन। 

फिर,
गमकने लग गए,
स्वर ढोल ताशों के। 


फिर, 
दहकने लग गए,
जंगल पलाशों के। 

-- तरुण प्रकाश 


गीत (5)


गिर गया,
फिर एक दिन,
अंधे कुएं में। 


फाइलों में, कुछ -
किताबों में गया। 
और कुछ, सूखे -
हिसाबों में गया।। 

जुड़ गया कुछ,
कंठ पर -
अटके जुएं में। 


कुछ फंसा, जग के -
बनाये जाल में,
और कुछ उलझा- 
निजी जंजाल में।। 

घुल गया कुछ,
काल के, 
धुंधले धुंए में। 
  

गिर गया,
फिर एक दिन,
अंधे कुएं में। 

-- तरुण प्रकाश 


गीत (6)

आज मस्ती में,
चलो आकाश छू लें। 

      (1)

चांद की मीनार से - 
रुनझुन बजाता,
कोई पग धीरे उठाता आ रहा है। 

शुक्र की-
बारादरी से जगमगाता ,
कोई मीठे गीत गाता आ रहा है। 

हम भरें पेंगे- 
समय के साथ झूलें। 

      (2)

शनि वलय के -
वस्त्र पहने घेर वाले,
कर रहा संकेत है कोई मिलन का । 

स्वर्ण तारों से -
सजी है मांग जिसकी ,
झिलमिलाता रंग शीशे के बदन का। 

घुल गया संयम,
रहीं कुछ शेष भूलें। 

      (3)

लाज की -
लाली सहेजे दूर मंगल, 
मुग्ध हो रति सेज को महका रहा है। 

शून्य में -
अनगिन झरोखें खोल कोई, 
ज्योति से भर-भर कलश ढलका रहा है। 

वक्ष में भर-
प्रीत के उच्छ्वास फूलें। 

--- तरुण प्रकाश

गीत (7)

कितना शेष,
रहा ये जीवन,
कितना बीत गया। 


बेमक़सद,
जीते जाने की,
रीति पुरानी है। 
भूसे की है,
ढेर शर्म -
चुल्लू भर पानी है । 

कितना नीर,
घड़े में बाकी,
कितना रीत गया। 


क्या लेकर,
आये थे जग में,
क्या ले जाना है। 
हानि-लाभ का,
व्यर्थ यहाँ, 
अनुमान लगाना है। 

कितना हारा,
मन दुनियां से, 
कितना जीत गया। 


प्लेटफॉर्म पर, 
रेलें सारी,
आती-जाती हैं, 
रूकती हैं, 
कुछ देर दृष्टि -
से फिर खो जाती हैं। 


एक मुसाफिर,-
बिछड़ा,
बन फिर दूजा मीत गया।


कितना शेष,
रहा ये जीवन,
कितना बीत गया। 

-- तरुण प्रकाश 

गीत (8)

रात कल,
आकाश ने, 
बादल निचोड़े। 


घाट पर,
मेला लगा था -
श्याम मेघों का सघन। 
धूल में,
लिपटे हुए थे, 
दूर तक जिनके बदन। . 

जल-कलश,
भर-भर -
नहाये कल निगोड़े। 


खींच कर,
अनगिन लकीरें,
रात के अंतिम पहर 
सूखने को - 
वस्त्र गीले,
अलगनी पर टांग कर। 

खोल 
बैठा था, 
हवा के बंद घोड़े। 


रात कल,
आकाश ने, 
बादल निचोड़े। 


--तरुण प्रकाश 

गीत (9)

अर्थ गहरे हैं, 
बड़े हैं,
किन्तु हैं संवाद छोटे। 

वर्तनी झूठी हुई है,
और झूठा व्याकरण। 
जो छिपाना था, प्रकट है,
और सच पर आवरण ।। 

झूठ के,
परिवाद लम्बे,
सत्य के प्रतिवाद छोटे। 

नाप पाया कौन तट से,
सिंधु की गहराइयाँ। 
आँक पाया कौन भू से,
व्योम की ऊंचाईंयां ।। 

नेह की पुस्तक-
सघनतम,
देह के अनुवाद छोटे। 

दुःख भरा है गठरियों में,
और चुटकी में ख़ुशी। 
ढेर थैलों में रुदन है,
मात्र जेबों में हँसी ।। 

जागरण के -
दंश गहरे,
स्वप्न के उन्माद छोटे। 

अर्थ गहरे हैं, 
बड़े हैं,
किन्तु हैं संवाद छोटे। 

-- तरुण प्रकाश 

गीत (10)

उसने फिर - 
धीरे से मन में, 
मेरा नाम छुआ। 

दहक उठे-
जंगल पलाश के,
महक उठा महुआ। 

   आमों के गदराने के दिन,
    आ कर ठहर गए। 
    ख़ुश्बू के खत ले हरकारे, 
    जग में बिखर गए। 

उसके फिर -
अधरों पर नभ से,
अमृत-राग चुआ। 

नाचे चीड़- कनार-
ताल दे,
थिरक उठा पछुआ । 



    मौसम ने श्रृंगार किया -
    शर्मा के, थम-थम के। 
    सूरज के कुमकुम से,
    सागर के दर्पण चमके। 

उसके फिर -
मन में मुझको ले,
कुछ-कुछ आज हुआ। 

खनक उठे -
कंगन- पॉज़ेबें, 
चहक उठा बिछुआ। 

    धरती पर बारात, हज़ारों-
    तारों की निकली । 
    आज चांदनी फिर चंदा के, 
    हाथों से फिसली । 

उसने फिर -
मुझको पाने की,
मांगी आज दुआ। 

कितना मीठा -
हुआ अचानक,
जीवन ये कड़ुआ।


-- तरुण प्रकाश