Sahityayan

Monday, 21 August 2017

शुभदा वाजपेयी की रचनाएँ

          हिन्दी की नवोदित कवयित्री शुभदा वाजपेयी विभिन्न पत्रिकाओं में छप 
         चुकी हैं । उन की अनेक रचनाएँ आकाशवाणी पर और कवि सम्मेलनों 
         में चाव से सुनी गईं । 
 यहाँ उन की कुछ गजलें और दोहे प्रस्तुत कर रहा हूँ । 
सुधेश
     
                   गजलें 

 दौलत का ज़खीरा हो ये अरमान नहीं है
दौलत के बिना जीना भी आसान नहीं है ।

दिल पर हैं मिरे उसकी हुकूमत के ही चर्चे
ये बात अलग है कि वो सुलतान नहीं हैं ।

मरना हो तो मरने पे मेरे आह करें लोग
मौका वो गँवा दूँ ये मेरी शान नहीं है ।

डूबी जो मिरी नाव तो डूबी है ये कैसे
सागर में तो कहने को भी तूफ़ान नहीं है ।
क है हुनर संग तराशी का सभी को
 पत्थर हैं यहा कोई भी इंसान नहीं है ।

पहरे हों भले लाख ज़माने के ए "शुभदा"
प्यासी मैं मरूं इसका भी इम्कान नहीं है।
  (2)
हासिल सुकूनो चैन उसे उम्र भर न हो
इतना भी ज़िंदगी में कोई  दर-ब-दर  न हो ।

वो आशिक़ी ही क्या है जो पागल न कर सके
वो हुस्न ख़ाक जिसका कि दिल पर असर न हो ।

फ़रियाद क्या, न जिसका हो माबूद पर असर
किस काम के वो अश्क कि दामन  भी  तर न हो ।

उस शख़्स से ज़ियादा भला बदनसीब कौन
दुनिया में जिसके पास कोई अपना घर न हो ।

अल्लाह रख सभी को तू अम्नो अमां के साथ
जो  हाल इस तरफ़ है कभी भी  उधर न हो ।

फिर लुत्फ़ क्या सफ़र का मंज़िल हो सामने
हमवार रास्ता हो कठिन रहगुज़र न हो ।

खो जाऊँ अपने आपमें कुछ इस तरह कभी
ढूँढा करूं  मैं  खु़द को, मुझे ही ख़बर न हो ।

रहने न दूंगी मैं भी इबादत में कुछ कमी
पर तेरी रहमतों में  भी कोई कसर न हो ।

"शुभदा" पे भी निगाहे करम कर मिरे ख़ुदा
इतना भी मुझ ग़रीब से तू बे ख़बर न हो ।

   (3)
 कर न पाया कोई जो वो काम उसने कर दिया
राहे उल्फ़त में मुझे बदनाम उसने कर दिया ।

 फेर कर मुंह यूं गया जैसे कोई रिश्ता न था
इक नए आगाज़ का अंजाम उसने कर दिया ।

ख़्वाब जो आंखों ने मेरी एक देखा था कभी
उसकी हर ताबीर को नाकाम उसने कर दिया ।

जुस्तजू जिसकी लिये जागी थीं आंखें रात भर
उम्र भर का हिज्र मेरे नाम उसने कर दिया ।

ज़िन्दगी में ये मिला मुझको  मुहब्बत का सिला
बेवफ़ा के नाम से बदनाम उसने कर दिया। ।

बेच कर ख़ुद को भी मैं क़ीमत चुका सकती नहीं
अपने दिल का इतना ऊंचा दाम उसने कर दिया ।

वो है "शुभदा" ख़ुद शराफ़त की बुलंदी पर मुक़ीम
कू ब कू मुझको मगर गुमनाम उसने कर दिया।


             दोहे 

जीवन कठिन सवाल सा,बोझिल -बोझिल श्वांस।
मेरे हिस्से में लिखा,ये कैसा उच्छ्वास।।

धनवानो का नगर ये,लगता बहुत अजीब।
दो रोटी सुख चैन की,होती नहीं नसीब।।

मौसम  सा है आदमी,पल-पल बदले रूप।
कभी प्रेम की छाँव है,कभी क्रोध की धूप ।।

सागर अब कैसे करे,यहां नदी का मान।
दगाबाज लहरें हुई,साहिल है हैरान।।

-थके से लोग हैं,मुरझाई सी शाम।
सूरज ने दिन लिख दिया,अंधियारे के नाम।
दूरूर देश के मेघ ये कब बरसाते नीर।
उमड़-घुमड़ कर ये सदा,दे जाते हैं पीर।।

सपना नयनों से सखे, लगा बहुत ही दूर।
जब तक लब खामोश हैं ,पूछे कौन हुजूर।।

गरी खोलो याद की,छोड़ो सभी मलाल।
अपना है बस पल यही,कहे गुजरता साल।।

राधा कहती श्याम से,सुनो हमारी बात।
जब तेरी बंसी बजे,सुध-बुध खोता गात।।

बता कौन संसार से ,गया किसी के साथ।
आया खाली हाथ  सब,जाना खाली हाथ।।

दुनियां की इस भीड़ में,लुटे सभी सुख चैन।
मन ये व्याकुल सा रहा,रहे बरसते नैन।।

करते जो संसार में,बस अच्छे ही काज।
वो ही तो सदियों तलक, दिल पर करते राज।।

समझा जिसको भी सगा, करी उसी ने घात।
कर यकीन उन पर सभी,कह दी मन की बात।।

जलता दीपक रात भर,लाता वही सुप्रात 
सपनो में आकर कभी,पूछो मन की बात।।

अनायास मैं चोंक कर,यूँ उठ जाती रात।
जैसे आई याद वो,अल्हड़पन की बात।।

कभी-कभी तकदीर भी,दिखलाती यूँ खेल।
अपने लगते गैर से,करते दुश्मन मेल।।

देख धुन्ध को हो रहे,आज सभी जन दंग।
धूप छुपी आकाश में,लेकर सूरज संग।।

निरक्षर को संसार में,कहीं मिले न मान।
रहता है बिन ज्ञान के,नर यहां पशु समान।।

अब रिश्तों की आड़ में, होते देखो पाप।
काला है कुछ दाल में,करो गौर ये आप।।

सभी जगह परिवार वह, पाता है सम्मान।
मात,पिता समझें सुता-सुत को एक समान।।
शुभदा वाजपेयी 



Monday, 31 July 2017

स्मरणीय प्रसंग

एक रुपया 

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर कलकत्ता में अध्यापन कार्य करते थे। वेतन का उतना ही अंश घर परिवार के लिए खर्च करते जितने में कि औसत नागरिक स्तर का गुजारा चल जाता। शेष भाग वे दूसरे जरूरतमंदों की, विशेषता छात्रों की सहायता में खर्च कर देते थे। आजीवन उनका यही व्रत रहा। 
वे गरीबी में पढ़े थे ओर निर्धनों के लिए आवश्यकताएँ पुरी करने में लगा देते। एक दिन वे बाजार में चले जा रहे थे। एक हताश युवक ने भिखारी की तरह उनसे एक पैसा माँगा। विद्यासागर दानी तो थे पर सत्पात्र की परीक्षा किये बिना किसी की ठगी में ने आते। युवक से जबानी में हट्टे कट्टे होते हुए भी भीख माँगने का कारण पूछा। सारी स्थिति जानने पर माँगने का औचित्य लगा। सो एक पैसा तो दे दिया पर उसे रोककर उससे पूछा कि यदि अधिक मिल जाय तो क्या करोगे? युवक ने कहा कि यदि एक रुपया मिल तो उसका सौदा लेकर गलियों में फेरी लगाने लगूंगा ओर अपने परिवार का पोषण करने में स्वावलम्बी हो जाऊंगा।
विद्यासागर ने एक रुपया उसे ओर दे दिया। उसे लेकर उसने छोटा व्यापार आरंभ कर दिया। काम दिन दिन बढ़ने लगा। कुछ दिन में वह बड़ा व्यापारी बन गया।
एक दिन विद्यासागर उस रास्ते से निकल रहे थे कि व्यापारी दुकान से उतरा उनके चरणों में पड़ा ओर दुकान दिखाने ले गया ओर कहा - यह आपका दिया एक रुपया पूंजी का चमत्कार है। विद्यासागर प्रसन्न हुए ओर कहा जिस प्रकार तुमने सहायता प्राप्त करके उन्नति की उसी प्रकार का लाभ अल्प जरूरतमंदों को भी देते रहना। पात्र उपकरण लेकर ही निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए वरन् वैसा ही लाभ अन्य अनेकों को पहुंचाने के लिए समर्थता की स्थिति में स्वयं कभी उदारता बरतनी चाहिए। व्यापारी ने वैसा ही करते रहने का वचन दिया।
महेश सिँह से साभार 

फेसबुक मे 13 .6.2017 को प्रकाशित ।

यह वर्णन सत्य हो या न हो पर श्रुति माध्यमकी महत्ताको दर्शाता है --
जब डॉ विश्वेश्वरैया ने ट्रेन एक्सीडेंट से पहले ट्रेन रोक दी, एक रोचक घटना
by shabdbeejteam /
डॉ विश्वेश्वरैया एक महान इंजीनियर, राजनेता और मैसूर के दीवान थे. भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित डॉ विश्वेश्वरैया के जीवन से जुड़ी यह रोचक घटना पढ़िए :- 
आधी रात का समय था. रात्रि के शांत अँधेरे में शोर मचाती हुई एक ट्रेन अपने गन्तव्य की ओर चली जा रही थी. एक व्यक्ति ट्रेन के डिब्बे में खिड़की से सिर टिकाकर सो रहा था. अचानक उसकी नींद खुल गयी.
वो एकदम से उछलकर अपनी सीट से उठा और सर के ऊपर लटक रही खतरे की जंजीर खींच दी. चेन खींचते ही ट्रेन धीमी होने लगी और थोड़ी दूर चल कर रुक गयी. ट्रेन के कर्मचारी, सहयात्री और अन्य डिब्बों के लोग उस डिब्बे में यह जानने के लिए गये कि क्या हुआ.
कुछ लोगों को ये लगा कि शायद इस आदमी ने नींद के झोंके में चेन खींची होगी. ये सोचकर वो गुस्से में भी आ गये. आखिर सभी लोगों ने उस आदमी को घेरकर पूंछा कि आखिर उसने ट्रेन क्यूँ खींची.
उस व्यक्ति ने आराम से जवाब दिया – ट्रेन ट्रैक में कुछ मीटर आगे एक क्रैक है. अगर ट्रेन उसके ऊपर से गुजरती तो अनहोनी घट सकती थी.
लोग इस बात से चौंक पड़े, वो बोले – क्या बात कर रहे हो. इस अंधेरी रात में, ट्रेन में बैठे बैठे आपको कैसा पता चल गया कि ट्रेन के आगे पटरी में क्रैक है ? क्या मजाक कर रहे हो ! 
चेन खींचने वाला आदमी बोला – जी नहीं. मुझे चेन खींचने और सबको परेशान करने का कोई इरादा नहीं है. आप लोग जाकर ट्रैक चेक करिए, उसके बाद मुझे बताइयेगा.
रेलवे के कर्मचारी ट्रेन से उतर कर टॉर्च लेकर ट्रैक चेक करने लगे. सभी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि वाकई ट्रेन जहाँ रुकी थी, उससे थोड़ी ही दूर पर ट्रैक में गहरा क्रैक था. अगर ट्रेन क्रैक के ऊपर से गुजरती तो उस अँधेरे, सूनसान इलाके में अवश्य ही बड़ी दुर्घटना घट जाती.
सभी लोग फिर से वापस उसी आदमी के पास पहुंचे जिसने इस बात की पूर्वसूचना दी थी. लोगों के पूछा कि आखिर आपको यह बात पहले ही कैसे पता चल गयी.
उस व्यक्ति ने बताया वो सोते हुए ट्रेन और ट्रैक की आवाज़ सुन रहा था और अचानक ही वह आवाज़ बदल गयी थी. ट्रैक के कम्पन से होने वाली आवाज़ में अचानक आये बड़े बदलाव से उसे पता चल गया कि ट्रैक में आगे अवश्य ही बड़ा क्रैक है.
आश्चर्यजनक रूप से ट्रेन एक्सीडेंट रोकने वाला यह व्यक्ति कोई और नहीं महान भारतीय इंजीनियर डॉ मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ही थे.
लीना मेँहँदले के सौजन्य से । 
फेसबुक मे 23.7.2017 को प्रकखशित ।

Saturday, 20 May 2017

हरियाणा की कवयित्री डेज़ी नेहरा की कविताएँ

हरियाणा की कवयित्री डेज़ी नेहरा की कविताओं में प्रेम की मादकता 
के साथ एक तार्शनिकता भी मिलती है । उन में प्रकृति के विभिन्न रंगों 
का वैभव भी मिलता है । 

उन का संक्षिप्त परिचय यह है । 

डॉ डेज़ी
एसोसिएट प्रोफेसरअंग्रेजीगर्ल्सकॉलेज
भक्त फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय
खानपुर कलां (सोनीपत


शिक्षाएम.., एम.फिल. (.एल.टी.)पी.एच.डी.

प्रकाशित हिंदी पुस्तकें: 2

1. आसकविता संग्रह (2010)
2. करवटें मौसम की, कविता संग्रह (2017)

यहाँ उन की कुछ चुनी हुई कविताएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

----  सुधेश


परम्परा

एक उत्तर
तो एक दक्षिण
स्वाभाव दोनों का
एकदम भिन्न

एक आसमां को निहारे
एक जमीन से भी नीचे
एक - दूसरे को कोसें दोनों
जबड़ों को भीचें 

एक है सादा सरल तो
एक पर चढ़ा ज़माने का रंग
अपनी-अपनी जिद के पक्के
कोई  बदले ढंग

एक को भाए मुक्ति
तो दूजे को बंधन
हर रोज लड़ते दोनों 
अक्सर ही रहती अनबन

किन्तु
फिर भी
ये जुड़े हैं
निभाने को

एक ऐसी परम्परा को
जो इजाजत नहीं देती
अलग होने की
सिर्फ इस वजह से
कि

प्रेम नहीं है



जवाँ बुलबुलोसब तुम्हारा ही तो है...


भरो उड़ान कि आसमाँ तुम्हारा ही तो है
ये गुलशनये गुलिस्तां तुम्हारा ही तो है !
पंख 'तुम्हारे', परवाज़ 'तुम्हारीहै
परक्षितिज के उस पार 'जाना मेरी बुलबुलों
ये इस पार जो 'है' - सब तुम्हारा ही तो है !

चहकोमहकोलहको
बस, 'बनाओ आदत गरजने की
क्यूंकि 'मिठासपर सारा हक़ - तुम्हारा ही तो है !

झपटे जो गिद्ध कोई
टूट पड़ो उस पर
ये कर्तव्यये अधिकार - तुम्हारा ही तो है !

पर रूप धरो तुम 'देवीसा
कि 'शक्तिका वरदान उन्हें
'अप्सराबन  दिखो सदा
सिर्फ 'रिझानेका मिला काम उन्हें
अब कौनसा रूप है धरना
ये सोचना - काम तुम्हारा ही तो है !

'शक्तिहै वोजिसने कुचले दानव भी
'मेनकातो बस कर सकती तप-भंग का तांडव ही

'दुर्गामें तो कभी  दिखी - लालसा किसी को रिझाने की
'मेनकाको कभी शक्ति  मिली - महिषासुरों को हराने की

मारना है 'पापकोथोड़ी पहल तुम भी करो
लेना है प्रतिकार तोथोड़ी पहल तुम भी करो

कामना है 'शक्तिकी - तो देवी सा रूप धरो
कि...
गुलों का प्यार बने गिद्धों का प्रहार
ये सवाल तुम्हारा और इसका जवाब भी तुम्हारा ही तो है!




दहलीज़

नज़रों ने खेला खेल था
होना तेरा मेरा मेल था
बरसों बीते संग जीते-जीते
दुःख को सीतेसुख को पीते

मैं 'नेहसे सीढ़ी चढ़ कब की 'देहतक पहुँच गयी
मान गयी ... समझ गयी ...हर तर्क 'देहका
पर ये अचम्भा ही रहेगा प्रिय
तुम क्यों लाँघ नहीं पाये 'देहकी देहलीज़


जी चाहता है ... 

जी चाहता है ...
छोड़ ये आत्मा का घर
जल्दी-बहुत जल्दी पहुंचू
जीवन से अगले पड़ाव पर

सोचता है मन मगर...
कहीं तरसूँगा तो नहीं
पाने को फिर 'यहीडगर
जहाँ हंसने-रोनेपाने-खोने का सफर

जहाँ आँख का पानी
बहे कहीं
कहीं बिन बहे लिखे
नित नयी कहानी

भीतर तक
चीरती वारदातें
अनकहे
दर्दों की बारातें

टिकाती घुटने
समेटती मन
झुकाये सरबना विनम्र
कराती नमन

परिपक्व हो फिर
प्रकृति के हर रूप से पुलकित
न्यौछावर पत्ते-पत्ते पर  
सृष्टि के कण-कण पे मोहित

मोह हो जैसे ही रब से
विछोह मन चाहे तब से
आता जो समझ जीवन-विस्तार
मन फिर तजना चाहे संसार
यही है सार ... यही है सार !

फिर
जी चाहता है...



जीना  गया समझो...


अपना दिल टूटे तो मुस्कुराने का दम
और उसकी 'ज़रा सीउदासी से पिघल जाए मन
तो जीना  गया समझो ...

पसंदीदा फूलों पे जान छिड़कते हो बेशक
पर जिस दिन समझ जाओगे काँटों का भी मन
तो जीना  गया समझो ...

ख़ास लोगों को सलाम करती है भले दुनिया
 जाएगा करना जब राह चलतों को नमन
तो जीना  गया समझो ...

मैंमेरामुझकोमुझसे ... से ज़रा दूर हो के
"इदं  ममव्यवहार में  गया जिस क्षण  
तो जीना  गया समझो.



जीवन

जीवन पानी-पानी है
कहीं ‘गंगा सा
उजला
तो - कहीं ‘यमुना सा
स्वतः ही काला I

झरना बन कर जीवन  
झरता पत्थरों पर
अपने निरंतर प्रवाह से -
किसी पत्थर को देता ‘काई की परत - ज्यों लिप्त भोगी की लगन
किसी को ‘भव्य आभा - ज्यों योगी का माथा I

झील का पानी
महत्वाकांक्षाओं से रहित - 'तृप्त
ठहरा रहे स्वयं  टिकाये रखे भीतर के सारे जीवन को - बरसों
एक आकर्षण ‘अतृप्त सैलानियों के लिए
जो भटकते ‘ठहराव के लिए I

अहा ! पानी बारिश का
मूसलाधारकहीं रिमझिमतो कहीं फुहार सा
बरसता -
कही क्रोधकहीं प्रेमतो कहीं आशीर्वाद सा
किन्तु... ओह !
बदलता मन  दिशा कहीं
कर जाता रेगिस्तान में अनाथ सा I

सागर के गागर में पानी
समेटे - अबूझअगणितअनकही कहानी
ज्यों हम सबकी दादी-नानी
जिनकी झुर्रियों सी लहरें
तट पर भिगोएं यूं हमें
कि जीवन के मीठेपन में
हमें याद रहे खारापन भी I

बरसता है - ठहरता है
पर पानी वही जो बहता है – ‘नदिया सा
रोके नहीं रुकता जो
आसमाँ से टपकी या धरती पे गढ़ी बाधाओं से

दशा बदलेदिशा बदले ... भले
पर
बनाये दम-ख़मतेज़-कभी मद्धम
पानी वही जो बहता है II  
जीवन वही जो रहता है II


डा डेज़ी नाहरा का फोटो