Sahityayan

Tuesday, 20 March 2018

नवगीत परम्परा

-मित्रो, नवगीत विमर्श पर मेरा यह आलेख लगभग एक दशक पूर्व लिखा गया था। कृपया इस पर अपना स्पष्ट मंतव्य देकर इस विमर्श को आगे बढ़ायें -

नवगीतः मेरी आत्मा की अंतर्साधना
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कविता की रचना प्रक्रिया का प्रश्न मनुष्य की आदिम सर्जना क्रिया से जुड़ा हुआ है। जिज्ञासु होकर जब पहली बार मनुष्य ने सृष्टि की सहज क्रियाओं को सहजानुभूति और एक सुखद अचरज भाव से अवलोका होगा, तभी संभवतः कविता के प्रथम वाक्यांशों, यथा - सूरज का उगना, उसका डूबना, हवा का मंद-मंद बहना या तूफानी होना, झरनों का झरना, नदी का कलकल करते प्रवाहित होना, पूनो के चाँद का हँसना, बरखा की रिमझिम, बिजुरी की दमक, पत्तों की सरसर या टपकन आदि का स्वतः ही प्रस्फुटन हो गया होगा। कालान्तर में इनमें से अधिकांश सृष्टि-क्रियाएँ रूढ़ होकर अपने काव्य-एहसास को खो बैठीं। किन्तु इन सृष्टि-क्रियाओं से ही उपजीं कई नई काव्यानुभूतियाँ भी जनमीं और इस प्रकार मनुष्य की कविता यात्रा नित नये रूप, नई आकृतियों से रूबरू होकर अग्रसर होती रहीं।

आज का समय जटिल प्रसंगों का है और इससे भाव-संज्ञान भी जटिल हुए हैं एवं इसके साथ काव्यानुभूति भी आज जटिल हो गई है। कविता की रचना प्रक्रिया की जब आज हम बात करते हैं, तो हम उन बौद्धिक दबावों को नज़रन्दाज नहीं कर सकते, जो सामूहिक अवचेतन के आदिम एहसासों से जुड़कर एक नये भाव-बोध की सृष्टि करते हैं। कविता क्योंकि मनुष्य की अनन्त भाषा सर्जना की सबसे परिष्कृत उपज है, उसमें भाव एवं विचारों का अमित गुम्फन संभव है। किसी कविता के जन्म से पूर्व की जो भावस्थिति होती है, उसको गूँगे के गुड़ की तरह महसूसा तो जा सकता है, किन्तु व्यख्यायित नहीं किया जा सकता।

जहाँ तक मेरी अपनी रचना प्रक्रिया का प्रश्न है, मुझे लगता है कि भीतर अवचेतन में पहले एक अस्पष्ट भाव-संज्ञान घुमड़ता है, जो एक या कई समानधर्मा समांतर अनुभवों से प्रेरित होता है। कई बार उन अनुभवों का अन्योन्याश्रित कोई सम्बन्ध भी नहीं होती। नदी की मेरी अनुभूति मेरे शहर लखनऊ की नदी गोमती से निश्चित ही जुड़ी है, किन्तु उसमें तमाम अन्य नदियों, जलधाराओं, जलसमूहों के अनुभव भी सम्मिश्रित हो जाते हैं। नदी मेरी काव्यानुभूति में मात्र एक शब्द या जल-प्रवाह की आकृति नहीं रह जाती।उसमें नदी का पूरा परिवेश यानी नदी के कछार एवं तटबंध, उन पर स्थित कच्चे-पक्के घाट, उन घाटों पर नहाते या पर्व-स्नान करते नर-नारी समूह, उनकी नदी के प्रति श्रद्धा-भक्ति, नदी पर तिरती नौकाएँ, उन पर बैठे लोग, उनकी विविध क्रियाएँ, उनसे उपजे तमाम तरह के स्वर-समूह, जलपक्षियों की कूजें, कभी कहीं सुनी नदीतट की या या नौका पर की वंशीधुन, केवटों और मछेरों के गान और उनकी हाँक, तट पर स्थित मन्दिर की घंटियों की रुनझुन, शंखनाद, आरती के स्वर, मस्जिद की अज़ान की गूँज, नदी में सिराये दीप और तिरतीं पुष्पांजलियाँ, रेती पर पाँवों के निशान, बच्चों के बनाये बालू के घरौंदे, नदी पर बनाआ पुल, उस पर गुज़रते विभिन्न वाहन, किनारे पर की किसिम-किसिम की वनस्पतियाँँ, उनके वासी पशु-पक्षी, कीट-पतिंगे आदि, कवि की नदी से जुड़ी सुख-दुख की स्मृतियाँ, उसका अपना निजी तथा जातीय संस्कार और न जाने क्या-क्या। यानी नदी नदी नहीं रह जाती, वह एक पूरा बाह्य-आंतरिक परिवेश, एक संस्कार हो जाती है। हाँ, इस सारी अवचेतनीय प्रक्रिया के बाद शुरू होती है इन अवचेतनीय बिम्बों के समांतर भाषा-आकृतियों यानी सही लफ़्ज़ों की तलाश। शब्दाकृतियाँ कुछ तो अनायास प्रस्फुटित होती जातीं हैं, कुछ का सायास मंथन होता है और फिर 'गिरा-अर्थ' की 'जल-बीचि' यानी 'कहियत भिन्न न भिन्न' की कीमियागिरी है। वह जब तक संपूर्ण नहीं हो जाती, कवि को चैन नहीं आती। मैं 'आह से उपजा होगा गान/उमड़कर आँखों से चुपचाप/बही होगी कविता अनजान' वाली कविता की रचना प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर पाता। मेरा अपना अनुभव है कि यह एक अनायास-सायास प्रक्रिया है, जो दिखने में अचानक होते हुए भी अचानक नहीं होती। भाव के भाषा-प्रतिबिंब की खोज इतनी सहज नहीं है, जैसा मान लिया जाता है। इसीलिए हर कविता कवि की दृष्टि में अधूरी रह जाती है। कवि की अनुभूति, अक्सर उसे लगता है, अनकही रह गई।

मैंने गीत विधा को अपनी काव्यानुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, क्योंकि मेरे व्यक्तित्व-निर्माण के कालखंड के संस्कार मूलतः गीतात्मक थे। माँ के द्वारा गाईं रामायण की चौपाइयाँँ, पिता के द्वारा हर रविवार की पारिवारिक बैठकों में राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की कविताओं का पाठ, युवा विधुर चाचा द्वारा बच्चन जी के विरह गीतों एवं सहगल के गानों का गायन तथा गली-मोहल्ले तथा परिवार के पर्व-उत्सव प्रसंगों में सोहर-सरिया, कजरी-आल्हा जैसे लोकगायन -- ये हैं मेरे बचपन के संस्कार। बाद में हिन्दी-अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन-काल में भी 'लिरिकल' या गीतात्मक काव्य-प्रसंगों ने ही मेरे अवचेतन को उद्वेलित किया। चित्रकला का मेरा किशोरावस्था का शौक़ भी लयात्मक ही रहा। सुन्दर-सुगढ़ आकृतियाँ एवं ध्वनियाँँ ही मुझे आकर्षित करती थीं। अस्तु, जब मुझे स्वयं काव्य-सृजन की प्रेरणा मिली, तो वह गीतात्मक ही होनी थी। मुक्तछंद की मेरी कविताएँ भी इस गीतात्मकता से अछूती नहीं रह पाई हैं। मेरे तईं कवि होने की पहली और आखिरी शर्त है मनुष्य होना यानी रागात्मक होना। अनुभूति का मूल स्वर मानुषी राग का है और वह गीतात्मक ही होता है।

आज के समय में गीत के प्रासंगिक होने का प्रश्न आज का नहीं है। जब अज्ञेय ने 'तार सप्तक' के दूसरे संस्करण की अपनी भूमिका में युग-संबंध के बदलने के साथ कविता के स्वरूप के बदलने की बात उठाई थी, तभी से इस बात की शंका व्यक्त की जाने लगी थी कि गीतकविता कहाँ तक वर्तमान जटिल जीवन प्रणाली को अभिव्यक्ति दे पायेगी। उस समय गीत का गिने-चुने अपवादों को छोड़कर जो मुख्यतः मंच-आश्रित गलदश्रु कोमल काया-स्वरूप था, उस पर तो यह शंका पूरी तरह मौजूँ बैठती थी, किन्तु उसी कालखंड में 'नवगीत' संज्ञा से अभिहित सुदूर गाँव-गली-खेड़ों-कस्बों में पल-बढ़ रहा गीत एक नई मुद्रा और तेवर के साथ नई कविता के समानांतर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहा था, जिसका भाव-संज्ञान पारम्परिक गीत के मुक़ाबले अधिक विस्तृत, अधिक सघन और अधिक सक्षम-सम्पन्न था। आज का नवगीत उसी पिछली सदी के छठे दशक के नवगीत की चौथी पीढ़ी का संस्करण है और उसने उन सभी संज्ञानों का संधान किया है, जिनके संबंध में उसकी सक्षमता संदिग्ध मानी गई थी। आज के जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नहीं है, जिसकी अभिव्यक्ति नवगीत में न हो पाई हो। 'गीति कविता ने कविता में विचारों के दरवाजे बंद किये हैं' या इसमें 'सामाजिक उत्तरदायित्व बोध नहीं हैं' जैसे नई कविता के तथाकथित मसीहों के ग़ैरजिम्मेदाराना वक्तव्य कितने अनर्गल हैं, कहने की आवश्यकता नहीं है। अपनी प्रखर मारक कहन से नवगीत ने आज की विसंगतियों एवं छल-छद्म की स्थितियों का जिस शिद्दत से आकलन किया है, उससे इन उत्तरदायित्वहीन वक्तव्यों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।जब तक मानुषी राग-विराग, आस्थाएँ एवं आस्तिकताएँ जीवित हैं, गीतकविता अप्रासंगिक नहीं हो सकती। माँ की ममता जैसी मनुष्य की मूल रागात्मक वृत्तियाँ जब तक शेष रहेंगी, गीत की अस्मिता भी तब तक प्रासंगिक रहेगी। आज के मशीनी, पदार्थिक, भोगपरक जीवन के तनावों और निरर्थकताओं से जब मनुष्य मुक्ति पाना चाहेगा, उसे जीवन की रागात्मकता की खोज करनी ही पड़ेगी और तब गीतकविता ही उसे सहारा और जीने का आधार देगी।

आज के नवगीत का कथ्य वह सब है, जो समग्र जीवन का सरोकार है। आज जो कुछ भी जीवन में है, जो कुछ भी अच्छा-बुरा घटित हो रहा है, वह सब नवगीत के कथ्य की परिधि में आता है। अस्तु, आज नवगीत सही अर्थों में समग्र जीवन का काव्य है।प्रारम्भ में नवगीत का कथ्य आंचलिक और प्रकृतिपरक अधिक था और उसकी भाषा और कहन भी प्रमुख रूप से लोकगीतात्मक थी, किन्तु आज उसके कथ्य के विस्तार के साथ उसकी भाषा, उसका शिल्प भी बहुआयामी हो गये हैं। वैसे तो शुरू से ही नवगीत प्रयोगधर्मी रहा है,हिंदी प्रदेश  किन्तु आज उसमें विभिन्न क्षेत्रीय आलोकों का ऐसा प्रसरण हुआ है कि वह समूचे हिन्दी प्रदेश की भाषागत एवं शिल्पगत विशिष्टताओं को समाहित कर उसका प्रतिनिधि काव्य बन गया है। उसमें आमफ़हम मुहावरेदार भाषा का प्रयोग बढ़ा है। उसके कहन की संवादात्मक मुद्रा आम ज़िन्दगी की मुद्रा है। बिम्बाकृतियों में सहजता आई है। वे अधिक जीवंत, अधिक सरल, अधिक सार्थक और अधिक सटीक हुई हैं। प्रतीक कथन भी, जो प्रारम्भ में नवगीत को दुरूह बनाता था, अब जीवन की आम स्थितियों से जुड़कर सहज-सरल हुआ है। समय के साथ नवगीत के ये आग्रह शिथिल पड़े हैं और वह भाषा, शिल्प, संरचना, सभी दृष्टियों से सहज हुआ है। यही है उसके विकास की दिशा।

जहाँ तक गीत तथा नवगीत में अंतर की बात है, नवगीत गीत तो है ही, किन्तु उसमें और भी बहुत कुछ ऐसा है, जो 'गीत' कही जाने वाली काव्य विधा में नहीं है। यह सच है कि नवगीत गीत से ही उपजा, किन्तु जैसे संतान में माता-पिता के गुणसूत्र होते हुए भी वह उनसे अलग होती है, वैसे ही नवगीत भी गीत से अलग है यानी वह गीत का 'क्लोन' नहीं है। उसकी गीत से निश्चित ही एकदम अलग इयत्ता है। गीत और नवगीत के बीच विवाद की बात अनपेक्षित है। मेरी राय में, ऐसा कोई विवाद है ही नहीं। गीत का अपना एक विधान है, नवगीत का अपना अलग विधान है। दोनों की विचार-पद्धति एवं भाव-संज्ञान में फ़र्क है। दोनों की आकृति में समानताएँ दिख सकती हैं, किन्तु उनमें जो दृष्टिकोण का अंतर है, वही उन्हें स्पष्ट रूप से एक-दूजे से अलगाता है। गीत एवं नवगीत संज्ञाओं के घालमेल से दोनों का अहित होगा। अस्तू, 'गीत को गीत ही रहने दो' जैसे आग्रहों को दोनों के बीच ग्रंथि नहीं बनने देना चाहिए। दोनों का अस्तित्त्व अपनी-अपनी जगह बरक़रार रहे, यही श्रेयस्कर होगा। हाँ, गीत को गीत ही रहने दें और नवगीत को नवगीत ही।

नवगीत गीत के भविष्य का काव्य है। नवगीत की जो प्रखर लोकाग्रही मुद्रा है और उसकी कहन में जो सूक्ष्म किन्तु सहज स्पष्टता एवं पारदर्शिता है, वही भविष्य की गीतकविता की दिशा है। उसे न तो आकाशकुसुम बनने दें और न ही लचर सपाटबयानी। गीत और अधिक सहज होकर हमारी जातीय अस्मिता को परिभाषित करे, फ़िलवक़्त की सही पड़ताल करते हुए सर्वकालिक बना रहकर कालजयी मानुषी आस्थाओं का भी पोषण करता रहे, भाषा के काव्यात्मक अचरज को निरंतर खोजता रहे, तभी वह भविष्य मेंं भी कविता की भूमिका निभा पायेगा।

---- कुमार रवीन्द्र

(प्रकाशितः प्रेसमेन, भोपाल 15 अगस्त 2009)

Monday, 21 August 2017

शुभदा वाजपेयी की रचनाएँ

          हिन्दी की नवोदित कवयित्री शुभदा वाजपेयी विभिन्न पत्रिकाओं में छप 
         चुकी हैं । उन की अनेक रचनाएँ आकाशवाणी पर और कवि सम्मेलनों 
         में चाव से सुनी गईं । 
 यहाँ उन की कुछ गजलें और दोहे प्रस्तुत कर रहा हूँ । 
सुधेश
     
                   गजलें 

 दौलत का ज़खीरा हो ये अरमान नहीं है
दौलत के बिना जीना भी आसान नहीं है ।

दिल पर हैं मिरे उसकी हुकूमत के ही चर्चे
ये बात अलग है कि वो सुलतान नहीं हैं ।

मरना हो तो मरने पे मेरे आह करें लोग
मौका वो गँवा दूँ ये मेरी शान नहीं है ।

डूबी जो मिरी नाव तो डूबी है ये कैसे
सागर में तो कहने को भी तूफ़ान नहीं है ।
क है हुनर संग तराशी का सभी को
 पत्थर हैं यहा कोई भी इंसान नहीं है ।

पहरे हों भले लाख ज़माने के ए "शुभदा"
प्यासी मैं मरूं इसका भी इम्कान नहीं है।
  (2)
हासिल सुकूनो चैन उसे उम्र भर न हो
इतना भी ज़िंदगी में कोई  दर-ब-दर  न हो ।

वो आशिक़ी ही क्या है जो पागल न कर सके
वो हुस्न ख़ाक जिसका कि दिल पर असर न हो ।

फ़रियाद क्या, न जिसका हो माबूद पर असर
किस काम के वो अश्क कि दामन  भी  तर न हो ।

उस शख़्स से ज़ियादा भला बदनसीब कौन
दुनिया में जिसके पास कोई अपना घर न हो ।

अल्लाह रख सभी को तू अम्नो अमां के साथ
जो  हाल इस तरफ़ है कभी भी  उधर न हो ।

फिर लुत्फ़ क्या सफ़र का मंज़िल हो सामने
हमवार रास्ता हो कठिन रहगुज़र न हो ।

खो जाऊँ अपने आपमें कुछ इस तरह कभी
ढूँढा करूं  मैं  खु़द को, मुझे ही ख़बर न हो ।

रहने न दूंगी मैं भी इबादत में कुछ कमी
पर तेरी रहमतों में  भी कोई कसर न हो ।

"शुभदा" पे भी निगाहे करम कर मिरे ख़ुदा
इतना भी मुझ ग़रीब से तू बे ख़बर न हो ।

   (3)
 कर न पाया कोई जो वो काम उसने कर दिया
राहे उल्फ़त में मुझे बदनाम उसने कर दिया ।

 फेर कर मुंह यूं गया जैसे कोई रिश्ता न था
इक नए आगाज़ का अंजाम उसने कर दिया ।

ख़्वाब जो आंखों ने मेरी एक देखा था कभी
उसकी हर ताबीर को नाकाम उसने कर दिया ।

जुस्तजू जिसकी लिये जागी थीं आंखें रात भर
उम्र भर का हिज्र मेरे नाम उसने कर दिया ।

ज़िन्दगी में ये मिला मुझको  मुहब्बत का सिला
बेवफ़ा के नाम से बदनाम उसने कर दिया। ।

बेच कर ख़ुद को भी मैं क़ीमत चुका सकती नहीं
अपने दिल का इतना ऊंचा दाम उसने कर दिया ।

वो है "शुभदा" ख़ुद शराफ़त की बुलंदी पर मुक़ीम
कू ब कू मुझको मगर गुमनाम उसने कर दिया।


             दोहे 

जीवन कठिन सवाल सा,बोझिल -बोझिल श्वांस।
मेरे हिस्से में लिखा,ये कैसा उच्छ्वास।।

धनवानो का नगर ये,लगता बहुत अजीब।
दो रोटी सुख चैन की,होती नहीं नसीब।।

मौसम  सा है आदमी,पल-पल बदले रूप।
कभी प्रेम की छाँव है,कभी क्रोध की धूप ।।

सागर अब कैसे करे,यहां नदी का मान।
दगाबाज लहरें हुई,साहिल है हैरान।।

-थके से लोग हैं,मुरझाई सी शाम।
सूरज ने दिन लिख दिया,अंधियारे के नाम।
दूरूर देश के मेघ ये कब बरसाते नीर।
उमड़-घुमड़ कर ये सदा,दे जाते हैं पीर।।

सपना नयनों से सखे, लगा बहुत ही दूर।
जब तक लब खामोश हैं ,पूछे कौन हुजूर।।

गरी खोलो याद की,छोड़ो सभी मलाल।
अपना है बस पल यही,कहे गुजरता साल।।

राधा कहती श्याम से,सुनो हमारी बात।
जब तेरी बंसी बजे,सुध-बुध खोता गात।।

बता कौन संसार से ,गया किसी के साथ।
आया खाली हाथ  सब,जाना खाली हाथ।।

दुनियां की इस भीड़ में,लुटे सभी सुख चैन।
मन ये व्याकुल सा रहा,रहे बरसते नैन।।

करते जो संसार में,बस अच्छे ही काज।
वो ही तो सदियों तलक, दिल पर करते राज।।

समझा जिसको भी सगा, करी उसी ने घात।
कर यकीन उन पर सभी,कह दी मन की बात।।

जलता दीपक रात भर,लाता वही सुप्रात 
सपनो में आकर कभी,पूछो मन की बात।।

अनायास मैं चोंक कर,यूँ उठ जाती रात।
जैसे आई याद वो,अल्हड़पन की बात।।

कभी-कभी तकदीर भी,दिखलाती यूँ खेल।
अपने लगते गैर से,करते दुश्मन मेल।।

देख धुन्ध को हो रहे,आज सभी जन दंग।
धूप छुपी आकाश में,लेकर सूरज संग।।

निरक्षर को संसार में,कहीं मिले न मान।
रहता है बिन ज्ञान के,नर यहां पशु समान।।

अब रिश्तों की आड़ में, होते देखो पाप।
काला है कुछ दाल में,करो गौर ये आप।।

सभी जगह परिवार वह, पाता है सम्मान।
मात,पिता समझें सुता-सुत को एक समान।।
शुभदा वाजपेयी 



Monday, 31 July 2017

स्मरणीय प्रसंग

एक रुपया 

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर कलकत्ता में अध्यापन कार्य करते थे। वेतन का उतना ही अंश घर परिवार के लिए खर्च करते जितने में कि औसत नागरिक स्तर का गुजारा चल जाता। शेष भाग वे दूसरे जरूरतमंदों की, विशेषता छात्रों की सहायता में खर्च कर देते थे। आजीवन उनका यही व्रत रहा। 
वे गरीबी में पढ़े थे ओर निर्धनों के लिए आवश्यकताएँ पुरी करने में लगा देते। एक दिन वे बाजार में चले जा रहे थे। एक हताश युवक ने भिखारी की तरह उनसे एक पैसा माँगा। विद्यासागर दानी तो थे पर सत्पात्र की परीक्षा किये बिना किसी की ठगी में ने आते। युवक से जबानी में हट्टे कट्टे होते हुए भी भीख माँगने का कारण पूछा। सारी स्थिति जानने पर माँगने का औचित्य लगा। सो एक पैसा तो दे दिया पर उसे रोककर उससे पूछा कि यदि अधिक मिल जाय तो क्या करोगे? युवक ने कहा कि यदि एक रुपया मिल तो उसका सौदा लेकर गलियों में फेरी लगाने लगूंगा ओर अपने परिवार का पोषण करने में स्वावलम्बी हो जाऊंगा।
विद्यासागर ने एक रुपया उसे ओर दे दिया। उसे लेकर उसने छोटा व्यापार आरंभ कर दिया। काम दिन दिन बढ़ने लगा। कुछ दिन में वह बड़ा व्यापारी बन गया।
एक दिन विद्यासागर उस रास्ते से निकल रहे थे कि व्यापारी दुकान से उतरा उनके चरणों में पड़ा ओर दुकान दिखाने ले गया ओर कहा - यह आपका दिया एक रुपया पूंजी का चमत्कार है। विद्यासागर प्रसन्न हुए ओर कहा जिस प्रकार तुमने सहायता प्राप्त करके उन्नति की उसी प्रकार का लाभ अल्प जरूरतमंदों को भी देते रहना। पात्र उपकरण लेकर ही निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए वरन् वैसा ही लाभ अन्य अनेकों को पहुंचाने के लिए समर्थता की स्थिति में स्वयं कभी उदारता बरतनी चाहिए। व्यापारी ने वैसा ही करते रहने का वचन दिया।
महेश सिँह से साभार 

फेसबुक मे 13 .6.2017 को प्रकाशित ।

यह वर्णन सत्य हो या न हो पर श्रुति माध्यमकी महत्ताको दर्शाता है --
जब डॉ विश्वेश्वरैया ने ट्रेन एक्सीडेंट से पहले ट्रेन रोक दी, एक रोचक घटना
by shabdbeejteam /
डॉ विश्वेश्वरैया एक महान इंजीनियर, राजनेता और मैसूर के दीवान थे. भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित डॉ विश्वेश्वरैया के जीवन से जुड़ी यह रोचक घटना पढ़िए :- 
आधी रात का समय था. रात्रि के शांत अँधेरे में शोर मचाती हुई एक ट्रेन अपने गन्तव्य की ओर चली जा रही थी. एक व्यक्ति ट्रेन के डिब्बे में खिड़की से सिर टिकाकर सो रहा था. अचानक उसकी नींद खुल गयी.
वो एकदम से उछलकर अपनी सीट से उठा और सर के ऊपर लटक रही खतरे की जंजीर खींच दी. चेन खींचते ही ट्रेन धीमी होने लगी और थोड़ी दूर चल कर रुक गयी. ट्रेन के कर्मचारी, सहयात्री और अन्य डिब्बों के लोग उस डिब्बे में यह जानने के लिए गये कि क्या हुआ.
कुछ लोगों को ये लगा कि शायद इस आदमी ने नींद के झोंके में चेन खींची होगी. ये सोचकर वो गुस्से में भी आ गये. आखिर सभी लोगों ने उस आदमी को घेरकर पूंछा कि आखिर उसने ट्रेन क्यूँ खींची.
उस व्यक्ति ने आराम से जवाब दिया – ट्रेन ट्रैक में कुछ मीटर आगे एक क्रैक है. अगर ट्रेन उसके ऊपर से गुजरती तो अनहोनी घट सकती थी.
लोग इस बात से चौंक पड़े, वो बोले – क्या बात कर रहे हो. इस अंधेरी रात में, ट्रेन में बैठे बैठे आपको कैसा पता चल गया कि ट्रेन के आगे पटरी में क्रैक है ? क्या मजाक कर रहे हो ! 
चेन खींचने वाला आदमी बोला – जी नहीं. मुझे चेन खींचने और सबको परेशान करने का कोई इरादा नहीं है. आप लोग जाकर ट्रैक चेक करिए, उसके बाद मुझे बताइयेगा.
रेलवे के कर्मचारी ट्रेन से उतर कर टॉर्च लेकर ट्रैक चेक करने लगे. सभी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि वाकई ट्रेन जहाँ रुकी थी, उससे थोड़ी ही दूर पर ट्रैक में गहरा क्रैक था. अगर ट्रेन क्रैक के ऊपर से गुजरती तो उस अँधेरे, सूनसान इलाके में अवश्य ही बड़ी दुर्घटना घट जाती.
सभी लोग फिर से वापस उसी आदमी के पास पहुंचे जिसने इस बात की पूर्वसूचना दी थी. लोगों के पूछा कि आखिर आपको यह बात पहले ही कैसे पता चल गयी.
उस व्यक्ति ने बताया वो सोते हुए ट्रेन और ट्रैक की आवाज़ सुन रहा था और अचानक ही वह आवाज़ बदल गयी थी. ट्रैक के कम्पन से होने वाली आवाज़ में अचानक आये बड़े बदलाव से उसे पता चल गया कि ट्रैक में आगे अवश्य ही बड़ा क्रैक है.
आश्चर्यजनक रूप से ट्रेन एक्सीडेंट रोकने वाला यह व्यक्ति कोई और नहीं महान भारतीय इंजीनियर डॉ मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ही थे.
लीना मेँहँदले के सौजन्य से । 
फेसबुक मे 23.7.2017 को प्रकखशित ।

Saturday, 20 May 2017

हरियाणा की कवयित्री डेज़ी नेहरा की कविताएँ

हरियाणा की कवयित्री डेज़ी नेहरा की कविताओं में प्रेम की मादकता 
के साथ एक तार्शनिकता भी मिलती है । उन में प्रकृति के विभिन्न रंगों 
का वैभव भी मिलता है । 

उन का संक्षिप्त परिचय यह है । 

डॉ डेज़ी
एसोसिएट प्रोफेसरअंग्रेजीगर्ल्सकॉलेज
भक्त फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय
खानपुर कलां (सोनीपत


शिक्षाएम.., एम.फिल. (.एल.टी.)पी.एच.डी.

प्रकाशित हिंदी पुस्तकें: 2

1. आसकविता संग्रह (2010)
2. करवटें मौसम की, कविता संग्रह (2017)

यहाँ उन की कुछ चुनी हुई कविताएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

----  सुधेश


परम्परा

एक उत्तर
तो एक दक्षिण
स्वाभाव दोनों का
एकदम भिन्न

एक आसमां को निहारे
एक जमीन से भी नीचे
एक - दूसरे को कोसें दोनों
जबड़ों को भीचें 

एक है सादा सरल तो
एक पर चढ़ा ज़माने का रंग
अपनी-अपनी जिद के पक्के
कोई  बदले ढंग

एक को भाए मुक्ति
तो दूजे को बंधन
हर रोज लड़ते दोनों 
अक्सर ही रहती अनबन

किन्तु
फिर भी
ये जुड़े हैं
निभाने को

एक ऐसी परम्परा को
जो इजाजत नहीं देती
अलग होने की
सिर्फ इस वजह से
कि

प्रेम नहीं है



जवाँ बुलबुलोसब तुम्हारा ही तो है...


भरो उड़ान कि आसमाँ तुम्हारा ही तो है
ये गुलशनये गुलिस्तां तुम्हारा ही तो है !
पंख 'तुम्हारे', परवाज़ 'तुम्हारीहै
परक्षितिज के उस पार 'जाना मेरी बुलबुलों
ये इस पार जो 'है' - सब तुम्हारा ही तो है !

चहकोमहकोलहको
बस, 'बनाओ आदत गरजने की
क्यूंकि 'मिठासपर सारा हक़ - तुम्हारा ही तो है !

झपटे जो गिद्ध कोई
टूट पड़ो उस पर
ये कर्तव्यये अधिकार - तुम्हारा ही तो है !

पर रूप धरो तुम 'देवीसा
कि 'शक्तिका वरदान उन्हें
'अप्सराबन  दिखो सदा
सिर्फ 'रिझानेका मिला काम उन्हें
अब कौनसा रूप है धरना
ये सोचना - काम तुम्हारा ही तो है !

'शक्तिहै वोजिसने कुचले दानव भी
'मेनकातो बस कर सकती तप-भंग का तांडव ही

'दुर्गामें तो कभी  दिखी - लालसा किसी को रिझाने की
'मेनकाको कभी शक्ति  मिली - महिषासुरों को हराने की

मारना है 'पापकोथोड़ी पहल तुम भी करो
लेना है प्रतिकार तोथोड़ी पहल तुम भी करो

कामना है 'शक्तिकी - तो देवी सा रूप धरो
कि...
गुलों का प्यार बने गिद्धों का प्रहार
ये सवाल तुम्हारा और इसका जवाब भी तुम्हारा ही तो है!




दहलीज़

नज़रों ने खेला खेल था
होना तेरा मेरा मेल था
बरसों बीते संग जीते-जीते
दुःख को सीतेसुख को पीते

मैं 'नेहसे सीढ़ी चढ़ कब की 'देहतक पहुँच गयी
मान गयी ... समझ गयी ...हर तर्क 'देहका
पर ये अचम्भा ही रहेगा प्रिय
तुम क्यों लाँघ नहीं पाये 'देहकी देहलीज़


जी चाहता है ... 

जी चाहता है ...
छोड़ ये आत्मा का घर
जल्दी-बहुत जल्दी पहुंचू
जीवन से अगले पड़ाव पर

सोचता है मन मगर...
कहीं तरसूँगा तो नहीं
पाने को फिर 'यहीडगर
जहाँ हंसने-रोनेपाने-खोने का सफर

जहाँ आँख का पानी
बहे कहीं
कहीं बिन बहे लिखे
नित नयी कहानी

भीतर तक
चीरती वारदातें
अनकहे
दर्दों की बारातें

टिकाती घुटने
समेटती मन
झुकाये सरबना विनम्र
कराती नमन

परिपक्व हो फिर
प्रकृति के हर रूप से पुलकित
न्यौछावर पत्ते-पत्ते पर  
सृष्टि के कण-कण पे मोहित

मोह हो जैसे ही रब से
विछोह मन चाहे तब से
आता जो समझ जीवन-विस्तार
मन फिर तजना चाहे संसार
यही है सार ... यही है सार !

फिर
जी चाहता है...



जीना  गया समझो...


अपना दिल टूटे तो मुस्कुराने का दम
और उसकी 'ज़रा सीउदासी से पिघल जाए मन
तो जीना  गया समझो ...

पसंदीदा फूलों पे जान छिड़कते हो बेशक
पर जिस दिन समझ जाओगे काँटों का भी मन
तो जीना  गया समझो ...

ख़ास लोगों को सलाम करती है भले दुनिया
 जाएगा करना जब राह चलतों को नमन
तो जीना  गया समझो ...

मैंमेरामुझकोमुझसे ... से ज़रा दूर हो के
"इदं  ममव्यवहार में  गया जिस क्षण  
तो जीना  गया समझो.



जीवन

जीवन पानी-पानी है
कहीं ‘गंगा सा
उजला
तो - कहीं ‘यमुना सा
स्वतः ही काला I

झरना बन कर जीवन  
झरता पत्थरों पर
अपने निरंतर प्रवाह से -
किसी पत्थर को देता ‘काई की परत - ज्यों लिप्त भोगी की लगन
किसी को ‘भव्य आभा - ज्यों योगी का माथा I

झील का पानी
महत्वाकांक्षाओं से रहित - 'तृप्त
ठहरा रहे स्वयं  टिकाये रखे भीतर के सारे जीवन को - बरसों
एक आकर्षण ‘अतृप्त सैलानियों के लिए
जो भटकते ‘ठहराव के लिए I

अहा ! पानी बारिश का
मूसलाधारकहीं रिमझिमतो कहीं फुहार सा
बरसता -
कही क्रोधकहीं प्रेमतो कहीं आशीर्वाद सा
किन्तु... ओह !
बदलता मन  दिशा कहीं
कर जाता रेगिस्तान में अनाथ सा I

सागर के गागर में पानी
समेटे - अबूझअगणितअनकही कहानी
ज्यों हम सबकी दादी-नानी
जिनकी झुर्रियों सी लहरें
तट पर भिगोएं यूं हमें
कि जीवन के मीठेपन में
हमें याद रहे खारापन भी I

बरसता है - ठहरता है
पर पानी वही जो बहता है – ‘नदिया सा
रोके नहीं रुकता जो
आसमाँ से टपकी या धरती पे गढ़ी बाधाओं से

दशा बदलेदिशा बदले ... भले
पर
बनाये दम-ख़मतेज़-कभी मद्धम
पानी वही जो बहता है II  
जीवन वही जो रहता है II


डा डेज़ी नाहरा का फोटो