Sahityayan

Wednesday, 14 August 2013

तुम शिखर बनो

 




   अपने प़िय मित्र और अनुजवत् डा श्याम निर्मम अब हमारे बीच नहीं हैं , पर उन के 
नव गीतों के स्वर जैसे मेरे कानों में गूँज रहे है ं । उन का एक गीत यहाँ प़स्तुत है ।

 तुम शिखर बनो
हम तो नींव हैं 
गहरे में और भी धसेंगे !

सूख गई
सलिला प्राणों की
दर्दों के जलतरंग बज उठे,
बचपन के, योवन के
मोहक मादक गुंजन 
सपनो में सिरज उठे !

तुम मुखर बनो
हम तो मौन हैं 
धड़कन के नगर में बसेंगे !छ

लिपटे हैं
शाख-शाख
सोमरसी चितवन के
किसलय एहसास

टूट गये
प्रकृतिजन्य
कल के सब दम्भी विश्वास !

तुम विपिन बनो
हम तो फूल हैं 
झर-झर कर रेत पर हसेंगे !

आँखों के
बरसाती बादल 
उमड़-घुमड़ रोज ही बरसते,

होठों पर 
प्यास के पठार 
बूँद-बूँद नीर को तरसते !

तुम जलधि बनो
हम तो द्वीप हैं 
मोती-से सीप में सजेगे !

अँधियारा लील गया 
मन के उजयारे की आब,
कुछ ने ही
पहचाने
तन के अभिशापित
अनुबन्धों के घाव !

तुम अमर बनो
हम तो जन्म हैं 
बार-बार बाँहों में मृत्यु को कसेंगे !

-- डा श्याम निर्मम 
( २४ दिसम्बर २०१२ को दिवंगत ) 
उन के पुत्र पराग कौशिक के सौजन्य से ।