Sahityayan

Sunday, 9 December 2012

कुछ और मुक्तक

   
                       मुक्तक
जिन को भोजन के लाले हैं 
जिन्हें ग़रीबी ने पाले हैं 
वे ही दुनिया को चला रहे 
जिन के पाँवों में छालें  हैं ।  
      दुनिया में द्वन्द्व विवाद  है 
      वह युद्धों से बर्बाद  है
      बस प्यार जहाँ मेहमान है
      दिल की बस्ती आबाद  है ।
दिल का दिल से संवाद है
यह वाद नहीं न विवाद है 
इस घायल दिल में दर्द जो 
कविता ंउस का अनुवाद  है ।
       आज कल क्या कहें रिश्तों से
       अर्थ में तब्दील रिश्तों से 
       आदमीयत की चमक ग़ायब 
        शक्ल से दिखते  फ़रिश्तों से  ।,
मर मिटे जो काम करते वही भूखे हैं 
धूप में जलते रहे जो वही सूखे हैं
पेट की जो भूख है सब को सताती  है
पेट जिन के ंभरे धन के वही भूखे हैं ।
        जो होता करने से होता
        ख़ाली बातों से क्या होता
        चींटी तो चढ़ गई हिमालय
         हांथी पड़ा पड़ा पर सोता ।
--सुधेश    
३१४सरल अपार्टमैैंट्स  द्वारिका  सैैक्टर १०  नई दिल्ली ११००७५