Sahityayan

Sunday, 24 February 2013

कुछ नई लघु कथाएँ

                  कुछ और लघु कथाएँ 

              नियति 
मल्होत्रा साहब की विदेशी कार सड़क पर मक्खन पर छुरी की तरह दौड़ रही थी कि 
अचानक उन्हें ब़ेक मारना पड़ा । सामने से भाग कर निकलता हुआ वो नांक पूँछता 
बच्चा बाल बाल बच गया ।
  "" कुत्ते का बच्चा "  सिगार झाड़ते हुए मल्होत्रा साहब के मुँह से गाली निकली ।
अपने क़ीमती वक़्त को घड़ी में झाँकने के बाद उन्होंने अपनी विदेशी कार मेन रोड 
पर मोड़ दी ।
 " भड़ाक "  उफ़ , मल्होत्रा साहब की विदेशी कार को वो ट्रक कई मीटर तक घसीटता 
ले गया । मल्होत्रा साहब की विदेशी कार को क्षतविक्षत  देख कर दर्शकों में से कोई 
कह रहा था  " साला  कुत्ते की मौत मारा गया " ।
            दृष्टिकोण 
समय धरती के मुआयने पर निकला था । रास्ते में एक जोड़ा पास से गुज़रा ।
 "हमारी शादी को चार साल हो गये हैं , पर ऐसा लगता है जैसे कल ही हुई हो । 
है ना " ।
सुन कर अजीब सा लगा । ख़ैर , वह आगे बढ़ गया और ख़ैराती हस्पताल में घुस 
गया । बिस्तर पर पड़ी एक ज़िन्दा लाश के पास से गुज़र रहा था कि मुँह से एक 
अस्फुट स्वर सुनाई दिया  --" एक एक पल एक साल लगता है ।अब तो मुक्ति 
दे ऊपर वाले ।" 
 समय को अपनी निरन्तर गति पर भ़म होने लगा था । तभी  सर्र से एक ट़क 
बराबर से गुज़र गया । कहीं बहुत दूर एक बस धीरे धीरे चलती सी दिखाई पड़
रही थी ।
 समय भी वापस चल पड़ा क्योंकि दृष्टिकोणों का अन्तर उसे समझ मे आने लगा 
था । 

                          बीच का अन्तर 
" पापा ,मैं आज स्कूल नहीं जाऊँगा ।आज सिनेमा ले कर चलो । "  मुन्नू ज़िद कर रहा 
था । दस पन्द्रह मिनट की हुज्जत के बाद महेन्द़ बाबू झल्ला कर बोल उठे  
" तुम्हें स्कूल नहीं जाना है तो मरो यहीं पर  । मुझे दफ़्तर के लिए तैयार होने दो ।" 
"पापा , दफ़्तर क्यों जाते हो ।" 
 " वहाँ पैसे मिलते हैं । स्कूल में देने पड़ते हैं ।" 
अपने पापा की झल्लाहट के बाद भी सुबकता हुआ मुन्नू स्कूल और दफ़्तर के बीच 
का अन्तर नहीं समझ पाया ।
             बात बढ़ गई 
टैंकर के पास बाल्टियां लिये लोग आपस में लड़ रहे थे ।जब मुन्ना से नहीं रहा गया 
तो वह पूछ ही बैठा  - " पापा , ये लोग लड़ क्यों रहे हैं ।" 
 " बेटे , पानी के ऊपर " पापा का जवाब था । 
और कुछ दिनों बाद रेडियो पर मुन्ना को सुनाई दिया  " पानी को ले कर हरियाणा 
और पंजाब में लड़ाई ।" 
और वह फिर पूछ  बैठा  "  पापा , ये हरियाणा और पंजाब कहाँ रहते हैं ।" 
आख़िर क्यों न पूछे , बात इतनी बढ़ जो गई थी । 
            आलोचना 
नए ज़माने के कम्प्यूटर भी कविताएँ लिखने लगे हैं ।ज़रूरत सिर्फ विचारों भरा गद्य
फ़ीड करने की रह गई है । और छपने के बाद जब कविता बाहर निकल कर आई तो 
एक ने कहा  " यह तो नयी कविता है ।" ।
 दूसरा बोला  " अरे कहाँ , यह तो कोरा का कोरा गद्य है ।" 
तीसरा चहका " अरे नहीं भाई , यह तो कम्प्यूटर कविता है " ।
 अन्ततः: तीसरे द्वारा की गई आलोचना सब को नई लगी और पसन्द आई ।