Sahityayan

Wednesday, 13 March 2013

मेरी कुछ ग़ज़लें

                        मेरी कुछ ग़ज़लें 

ज़बां लफ्ज़े मुहब्बत है 
दिलों में पर अदावत है ।
           न कोई रूठना मनना 
            यही तुम से शिकायत है ।
कि बस रोज़ी कमाते सब 
नहीं कोई हिकायत है ।
            मुहब्बत ही तो जन्नत है 
            अदावत दिन क़यामत है ।
पढ़ो तुम बन्द आँखों से 
लिखी दिल पै इबारत है ।
            ग़रीबों से जो हमदर्दी 
            यही सच्ची इबादत़ है ।
कभी यों ग़ज़ल कह लेता 
बड़ी उस  की इनायत है ।

इक्कीसवीं सदी है इक्कीसवीं सदी है 
अब नेकियों पै जीती हर रोज़ ही बदी  है ।
             इस का न कोई चश्मा न गंगोत्री कहीं पर 
             बहती ही जा रही यह वक़्त की नदी है ।
पलकें बिछा के बैठे हम उन के रास्ते में 
आँखों में गुज़रा जो पल जैसे इक सदी है ।
             कैसे मैं आजकल  की दुनिया में सफल होता 
             मेरी ख़ुदी के ऊपर अब मेरी बेख़ुदी है । 
गांधी न बुद्ध गौतम न रिषभ का ज़माना 
अब तो ख़ुदा से ऊँची इन्सान की ख़ुदी  है ।

--- सुधेश 
         दुनिया के सुख पल दो पल के 
         गहरे रंग भी होते हल्के ।
मन के उड़ने वाले घोड़े 
कहीं न पहुँचे बरसों चल के ।
        ज्वाला में जल कुन्दन बनता 
        मैं लोहा ही रहा जल जल के ।
वे अमरित पी कर भी प्यासे 
कुछ प्यासे हैं गंगा जल के ।
        उन के कान न चीख़ें सुनते 
        वे बहरे हैं कोलाहल  के ।
बाहर शोर बहुत दुनिया का 
मन में बोलो हल्के हल्के  ।
         दुनिया नाटक सुख अभिनेता 
         दुख आता है रूप बदल के ।
मेरी इच्छाएँ बालक सी 
रह जाती हैं रोज़ मचल के । 


         अब हो के मेहरबाँ कभी दर्शन तो दीजिए 
         जलवा हो जिस में झिलमिल दर्पण तो दीजिए ।
ये काँप से रहे हैं जुनूने इश्क़ में 
होंठों को मेरे होंठ का चुम्बन तो दीजिए ।
         ये ज़ुल्म की हवाएँ बरसा रही हैं शोले 
         माथे पै मेरे प़ेम का चन्दन तो दीजिए ।
मैदानेजंग लगती है ये आज की दुनिया 
इस ज़िन्दगी को घर का आँगन तो दीजिए ।
       ख़ामोशियों के लमहे हैं उम़क़ैद जैसे 
      ख़ामोशियाँ जो तोड़े क़न्दन तो दीजिए ।
--सुधेश