Sahityayan

Wednesday, 29 May 2013

रोटी ताज़ी है या बासी

       'रोटी ताज़ी है या वासी'

कहानी कुछ इस प्रकार है -- एक धनी परिवार की कन्या(तारा ) का विवाह ,एक सुयोग्य परिवार मे होता है ,लड़का पढ़ा लिखा और अति सुन्दर लेकिन बेरोजगार था। परिवार की आर्थिक स्थति बहुत ही अच्छी थी जिसके कारण उसके माता -पिता उसे किसी भी कार्य करने के लिये नहीं कहते थे और कहते थे कि बेटा(जिगर ) तू हमारी इकलौती संतान है ,तेरे लिये तो हमने खूब सारा धन दौलत जोड़ दिया है और हम कमा रहे है, तू तो बस मजे ले ।

इस बात को सुनकर लड़की (तारा) बेहद चिंतित रहती मगर किसी से अपनी मन की व्यथा कह नहीं पाती । एक दिन एक महात्मा जो छ:माह मे फेरी लगाते थे उस घर पर पहुँच गये और बोले । माई एक रोटी की आस है लड़की (तारा ) रोटी ले कर महात्मा फ़क़ीर को देने चल पड़ी ,सास भी दरबाजे पर ही खडी थी । महात्मा ने लड़की से कहा बेटी रोटी ताजा है या वासी लड़की (तारा) ने जबाब दिया कि महाराज रोटी वासी है।

सास बही खडी सुन रही थी और उसने कहा हरामखोर तुझे ताजी रोटी भी वासी दिखाई पड़ रही है ।महात्मा चुप चाप घर से मुख मोड़ कर चल पड़ा और लड़की (तारा ) से बोल़ा कि बेटी मे उस दिन वापस आऊंगा जब रोटी ताजा होगी ।

समय व्यतीत होता गया और तारा के पति (जिगर ) को कुछ समय बाद रोजगार मिल गया। अब तारा बहुत खुशी रहने लगी । कुछ दिन बाद महात्मा जी वापस फेरी लगाने आये और तारा के ससुराल जाकर रोटी मांगने लगे, महात्मा के लिये तारा रोटी लाती है । महात्मा जी का फिर बही सबाल था, बेटी रोटी ताजा है या वासी तारा ने जबाब दिया की महात्मा जी रोटी एक दम ताजी है,महात्मा ने रोटी ले ली और लड़की को खुशी से बहुत आशीर्वाद दिया।

सास दरबाजे पर खडी सुन रही थी और बोली की हरामखोर उस दिन तो रोटी वासी थी और आज ताजा वाह! बहुत बढ़िया संत रुके और बोले अरी पगली तू क्या जाने तू तो अज्ञानी है तेरी बहू वास्तब मे बहुत होशियार है जब मे पहले आया था तो इसने रोटी को वासी बताया था क्योकि यह तुम्हारे जोड़े और कमाये धन से गुजारा कर रहे थे जो इनके लिये वासी था । मगर अब तेरा बेटा रोजगार पर लग गया है और अपनी कमाई का ताजा धन लाता है इसलिये तेरी बहू ने पहले वासी और अब ताजी रोटी बताई । माँ बाप का जुड़ा धन किसी ओखे- झोके के लिये होता है जो वासी होता है , काम तो अपने द्वारा कमाये ताजा धन से ही चलता है । सास महात्मा के पैरों मे गिर पड़ी और उसको ताजी वासी का ज्ञान व अपनी बहू पर गर्व हुआ इसलिये मानव को हमेशा जुडे धन पर आश्रित नहीं रहना चाहिये वल्कि सदैव ताजे धन की ओर ललायित रहना चाहिये ,अगर हम जुडे धन पर ही आश्रित रहेंगे तो वो भी एक दिन खत्म हो जायेगा इसलिये हमे ताजा धन की आस करके सदैव प्रगति पथ पर निरंतर प्रवाह करना चाहिये ।

लेखक :- डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )