Sahityayan

Friday, 27 September 2013

नई लघु कथाएँ


             नई लघु कथाएँ

       गुनहगार

रात देर से आये थे, इसलिए सुबह नींद भी देर से खुली। तभी ध्यान आया कि कामवाली नहीं आई। शुक्र है उसने अपना फोन नम्बर दे रखा है। फोन लगाया।
उसका पति बोला कि रीटा बीमार है। काम पर आ नहीं सकती।
पता नहीं कैसे पारा चढ़ गया-क्यों नहीं आ सकती? घर सारा बिखरा पड़ा है। कपड़े धुलवाने हैं। हम कहां जायें?
कामवाली का पति बोला-कहा न साहब कि वह बीमार है, आ नहीं सकती। दवा लेकर लेटी हुई है। बात भी नहीं कर सकती।
-हम तीन दिन बाद आये। पहले ही छुट्टियां दे दीं। अब काम वाले दिनों में भी छुट्टी करेगी तो कैसे चलेगा?
-क्या उसे बीमार होने का हक भी नहीं है? बीमारी क्या छुट्टियों का हिसाब लगा कर आयेगी, साहब?
-हम कुछ नहीं जानते, कोई इंतजाम करो।
-ठीक है साहब, मेरे बच्चे काम करने आ जाते हैं।
कुछ समय बाद स्कूल यूनिफॉर्म में दो छोटे बच्चे आ गये। फटाफट क्रिकेट की तरह काम करने लगे। एक छोटी बच्ची थी और दूसरा उससे थोड़ा बड़ा भाई। बच्ची ने बर्तन मांजे, भाई ने झाड़ू लगाया। काम खत्म कर पूछा-अब जायें, साहब?
मैंने पूछा-पहले भी कहीं काम करने गये हो?
बच्चों ने सहम कर कहा-नहीं साहब, मां ने कराहते हुये कहा था कि जाओ, काम कर आओ। नहीं तो नौकरी जायेगी।
मैं शर्मिंदा हो गया। कितनी बार बाल-श्रमिकों पर रिपोर्ट लिखीं। आज कितना बड़ा गुनाह कर डाला। मैंने ही अपनी आंखों के सामने बाल-श्रमिकों को जन्म दिया। इससे बड़ा गुनाह क्या हो सकता है? अपनी आत्मा पर इसका बोझ कब तक उठाऊंगा? मैंने उन्हें बिस्कुट व कुरकुरे के पैकेट दिये पर लगा कि जैसे अपने गुनाह को कम करने की कोशिश कर रहा हूं। गुनाह तो बहुत बड़ा है ।

-- कमलेश भारतीय
( हिसार , हरियाणा )


  एक साधु

एक साधु बहुत बूढ़े हो गए थे। उनके जीवन का आखिरी क्षण आ
पहुँचा। आखिरी क्षणों में उन्होंने अपने शिष्यों और चेलों को पास
बुलाया। जब सब उनके पास आ गए, तब उन्होंने अपना पोपला मुँह
पूरा खोल दिया और शिष्यों से बोले-'देखो, मेरे मुँह में कितने दाँत बच गये हैं
शिष्यों ने उनके मुँह की ओर देखा । कुछ टटोलते हुए वे लगभग एक
स्वर में बोल उठे 'महाराज आपका तो एक भी दाँत  शेष नहीं बचा ।
शायद कई वर्षों से आपका एक भी दाँत नहीं है।'
साधु बोले-'देखो, मेरी जीभ तो बची हुई है।'
सबने उत्तर दिया-'हाँ, आपकी जीभ अवश्य बची हुई है।' इस पर
सबने कहा-'पर यह हुआ कैसे ?
मेरे जन्म के समय जीभ थी और आज मैं यह चोला छोड़ रहा हूँ ।
तो भी यह जीभ बची हुई है। ये दाँत पीछे पैदा हुए, ये जीभ से पहले
कैसे विदा हो गए? इसकाक्या कारण है, कभी सोचा?'
शिष्यों ने उत्तर दिया-'हमें मालूम नहीं। महाराज, आप ही बताइये " ।
उस समय मृदु आवाज में संत ने समझाया- 'यही रहस्य बताने के
लिए मैंने तुम सबको इस बेला में बुलाया है। इस जीभ में माधुर्य
था, मृदुता थी और खुद भी कोमल थी इसलिए वह आज भी मेरे
पास है परंतु मेरे दाँतों में शुरु से ही कठोरता थी , इसलिए वे पीछे आकर
भी पहले खत्म हो गए, अपनी कठोरता के कारण ही ये दीर्घजीवी नहीं हो
हो सके। दीर्घजीवी होना चाहते
हो तो कठोरता छोड़ो और विनम्रता सीखो।'

-- वैभव कान्त आदर्श
( पलामू , बिहार )

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एक बार एक शहरी परिवार मेले मेँ घुमने गया,मेले मेँ 1 घंटे तक घुमे कि अचानक उनका बेटा मेले मेँ
खो गया ।दोनो पति-पत्नी मेले  मेँ बहुत ढ़ुढ़तेहै, लेकिन लङका नही मिलता है ।लङके की माँ जोर-जोर से रोने लगती है ।बाद मेँ पुलिस को सुचना देते है ।आधे घण्टे बाद लङका मिल जाता है । लङके के मिलते ही उसका पति गाँव का टिकिट लेकर आता है, और वो सब बस मेँ बेठ कर गाँव रवाना हो जाते हैं ।
तभी पत्नी ने पुछा: हम गाँव क्यो जा रहे है, अपने घर नही जाना है क्या? तभी उसका पति बोला:
" तू  अपनी औलाद के बिना आधा घण्टा नही रह सकती, तो मेरी माँ गाँव मेँ पिछले 10 सालों से
मेरे बिना कैसे जी रही होगी..??
माँ-बाप का दिल दु:खाकर आजतक कोई सुखी नही हुआ ।
                                Xx.      Xx

आप लोग हमेशा पूछते हैं न की पापी लोगों को भगवान् धरती पर क्यूँ रखे हुए है? तो लीजिये जवाब..एक छोटी सी कहानी के रूप में..
एक हिरनी को नदी किनारे पानी पीते देख बहेलिये ने तीर चलाने की सोची। परन्तु हिरनी बोल पड़ी, "ठहरो, तुम मुझे मारकर खा लेना पर पहले मुझे अपने बच्चों को प्यार कर उन्हें अपने पति के पास पहुँचा आने दो।"
कुछ सोचकर बहेलिये ने हिरनी की बात मान ली। हिरनी ख़ुश होकर अपने बच्चों के पास आई, उन्हें प्यार किया और फिर पति को सारा क़िस्सा सुनाया। हिरन ने कहा, "तुम बच्चों को लेकर घर जाओ और मैं बहेलिये के पास जाता हूँ।" हिरनी ने कहा, "यह कैसे हो सकता है? वचन में मैं बँधी हूँ, तुम नहीं।" यह सुन बच्चे बोले, "हम अकेले कहाँ रहेंगे।" अतः चारों बहेलिये के पास पहुँचे। उन सब को देख बहेलिये ने सोचा कि उसके हाथ लाटरी लग गई है।
उधर हिरनी की बातें सियार ने सुन लीं थी। वह दौड़कर शेर के पास गया और सारा क़िस्सा बताकर बोला, "हज़ूर, आपका अन्न भंडार लूटा जा रहा है। चलिये, जल्दी कुछ करिये।"
अतः जैसे ही बहेलिया हिरणों पर तीर चलाने को हुआ तो पीछे से झपटकर शेर ने उसे दबोच लिया। हिरनी अपने परिवार सहित जंगल में भाग खड़ी हुई।
यह कथा वचन निभाने के महत्व को रेखांकित तो करती ही है पर यह भी बताती है कि सुजनों की रक्षा के लिये ईश्वर कभी-कभी दुर्जनों का भी उपयोग करते हैं। इसलिये सक्षम होकर भी ईश्वर दुर्जनों का संपूर्ण नाश नहीं करते ।

-- वैभव कान्त आदर्श
( नई दिल्ली )