Sahityayan

Friday, 4 October 2013

स्मरणीय संस्मरण

                                          स्मरणीय संस्मरण 

यहाँ ब्रिटेन के ब्रिस्टल नगर के आरनोस वेल कब्रिस्तान में राजा राममोहन राय (1774-1833) की समाधि है। परसों 27 सितंबर को उनकी 180वीं पुण्यतिथि थी। कब्रिस्तान में उनकी समाधि की बात सुन एकदम आश्चर्य होता है।

बहुत ही कम लोगों को ज्ञात होगा कि यात्रा के मध्य मेनिनजाईटिस हो जाने के कारण यहाँ ब्रिटेन में ही उनका अप्रत्याशित निधन हो गया था। उस युग में ब्रिटेन में दाह-संस्कार की अनुमति नहीं थी, अतः उनके शव को भूमि में यों ही दबा / समाहित कर दिया गया था। 

वह समाधि तब से धूल-धूसरित, टूटी-फूटी, अज्ञात, उपेक्षित व बुरे हाल में पड़ी थी। एक भारतीय पारसी से विवाह करने वाली अंग्रेज़ महिला कार्ला कॉन्ट्रैक्टर ने इसके जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया। कोलकाता के एक व्यवसायी व तत्कालीन मेयर के सहयोग से 5 वर्ष पूर्व ही उन्होंने इसका पुनरुद्धार करवाया और इसे एक भव्य समाधि का रूप दिया। कार्ला के प्रयासों से ही हाथीदाँत से बनी राजा की एक दुर्लभ मूर्ति को भी समाधि-भवन में सँजो कर रखा गया है। परसों ब्रिस्टल में राजा राममोहन राय की उसी समाधि पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। ध्यातव्य है कि ब्रिस्टल नगर में एक प्रमुख स्थान पर चमकीले काले पत्थर से बनी राजा राममोहन राय की लगभग दो मंजिला ऊँचाई की एक प्रतिमा भी स्थापित है, जिसमें में वे पुस्तकें हाथ में पकड़े खड़े हैं। 

-- कविता वाचक्नवी 
( लन्दन , बृटेन )


किसी गाँव में रहने वाला एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया।
शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो लड़के ने नाव के किराये के लिए जेब में हाथ डाला।
जेब में एक पाई भी नहीं थी।
लड़का वहीं ठहर गया।
उसने अपने दोस्तों से कहा कि वह और थोड़ी देर मेला देखेगा।
वह नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े।
उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था।
उसके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव आँखों से ओझल हो गई, तब लड़के ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया।
उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भीआधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाहों ने भी लड़के को रोकने की कोशिश की।
उस लड़के ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा। पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा, लेकिन वह लड़का रुका नहीं, तैरता गया। कुछ देर बाद वह सकुशल दूसरी ओर पहुँच गया।
उस लड़के का नाम था लालबहादुर शास्त्री ’

-- पंकज गौतम 
( नई दिल्ली ) 


एक बार अब्दुल कलाम जी का इंटरव्यू लिया जा रहा था. उनसे एक सवाल पूछा गया. और उस सवाल के जवाब को ही मैं यहाँ बता रहा हूँ -
सवाल: क्या आप हमें अपने व्यक्तिगत जीवन से कोई उदहरण दे सकते हैं कि हमें हार को किस तरह स्वीकार करना चाहिए? एक अच्छा लीडर हार को किस
तरह फेस करता हैं ?
अब्दुल कलाम जी .. मैं आपको अपने जीवन का ही एक अनुभव सुनाता हूँ. 1973 में मुझे भारत के सेटेलाईट लॉन्च प्रोग्राम, जिसे SLV-3 भी कहा जाता हैं, का हेड बनाया गया । हमारा लक्ष्य था की 1980 तक किसी भी तरह से हमारी सॅटॅलाइट ‘रोहिणी’ को अंतरिक्ष में भेज दिया जाए. जिसके लिए मुझे बहुत बड़ा बजट दिया गया और ह्यूमन रिसोर्सेज भी उपलब्ध कराया गया, पर मुझे इस बात से भी अवगत कराया गया था की निश्चित समय तक हमें येलक्ष्य पूरा करना ही हैं ।
हजारों लोगों ने बहुत मेहनत की । 1979 तक । शायद अगस्त का महिना था, हमें
लगा की अब हम पूरी तरह से तैयार हैं।
लॉन्च के दिन प्रोजेक्ट डायरेक्टर होने के नाते. मैं कंट्रोल रूम में लॉन्च बटन दबाने के लिए गया ।
लॉन्च से 4 मिनट पहले कंप्यूटर उन चीजों की लिस्ट को जांचने लगा जो जरुरी थी.
ताकि कोई कमी न रह जाए. और फिर कुछ देर बाद कंप्यूटर ने लॉन्च रोक दिया l
वो बता रहा था की कुछ चीज़े आवश्यकता अनुसार सही स्तिथि पर नहीं हैं l
मेरे साथ ही कुछ एक्सपर्ट्स भी थे. उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया की सब कुछ ठीक है, कोई गलती नहीं हुई हैं और फिर मैंने कंप्यूटर के निर्देश को बाईपास कर दिया और राकेट लॉन्च कर दिया.
पहली स्टेज तक सब कुछ ठीक रहा, पर सेकंड स्टेज तक गड़बड़ हो गयी. राकेट अंतरिक्ष में जाने के बजाय बंगाल की खाड़ी में जा गिरा । ये एक बहुत ही बड़ी असफ़लता थी ।
उसी दिन, इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन (I.S.R.O.) के चेयरमैन प्रोफेसर सतीश धवन ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई । प्रोफेसर धवन, जो की संस्था के प्रमुख थे. उन्होंने मिशन की असफ़लता की सारी ज़िम्मेदारी खुद ले ली और कहा कि हमें कुछ और तकनीकी उपायों की जरुरत थी ।
पूरी देश दुनिया की मीडिया वहां मौजूद थी । उन्होंने कहा की अगले साल तक ये कार्य संपन्न हो ही जायेगा ।
अगले साल जुलाई 1980 में हमने दोबारा कोशिश की । इस बार हम सफल हुए । पूरा देश गर्व महसूस कर रहा था ।
इस बार भी एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई गयी.. प्रोफेसर धवन ने मुझे साइड में बुलाया और कहा – ”इस बार तुम प्रेस कांफ्रेंस कंडक्ट करो.”
उस दिन मैंने एक बहुत ही जरुरी बात सीखी ....
जब असफ़लता आती हैं तो एक लीडर उसकी पूरी जिम्मेदारी लेता हैं और जब सफ़लता मिलती है तो वो उसे अपने साथियों के साथ बाँट देता हैं ।

-- अमित राय जैन 
( फेस बुक से साभार ) 
प़वीण वशिष्ठ के सौजन्य से ।