Sahityayan

Thursday, 10 October 2013

कुछ नए मुक्तक

कुछ नए मुक्तक

मेरे  जज़्बात मेरे नाम बिके,
उनके ईमान सरेआम बिके..
.ऐसी मंडी है सियासत जिस मे,
तेरे अल्लाह मेरे राम बिके..!

--कमल मिश्र

ह्रदय से जीत की जब भावनाएं रूठ जाती हैं,
सफलता की सभी सभावनाएं रूठ जाती हैं,
हवाओं में ज़हर जब ये सियासत घोल देती है,
तो फिर सौहार्द्र और सद्भावनाएं रूठ जाती हैं।
-- समीर परिमल
( पटना  , बिहार )

रमा शंकर शुक्ल
सब कहते हैं इधर तुम दिखते नहीं हो
कंगाली में रहकर भी बिकते नहीं हो
वे इतना बिके कि अब बाज़ार हो गए हैं
फिर भी कहते हैं कि ईमान पर लिखते नहीं हो।

--रमा शंकर शुक्ल
( मिर्ज़ापुर, उ प़ )

अक़्ल ये कहती है, सयानों से बनाए रखना
दिल ये कहता है, दीवानों से बनाए रखना
लोग टिकने नहीं देते हैं कभी चोटी पर
जान-पहचान ढलानों से बनाए रखना

- बालस्वरूप राही
( दिल्ली )

भरोसा मत करो साँसों की डोरी टूट जाती है
छतें महफ़ूज़ रहती हैं हवेली टूट जाती है
किसी दिन प्यास के बारे में उससे पूछिये जिसकी
कुएँ में बाल्टी रहती है रस्सी टूट जाती है

- मुनव्वर राना

खूबसूरत पहल सा लगता है ,
खत तुम्हारा गजल सा लगता है ।
हमने लमहे बिताये सालों में ,
तुमको सब एक पल सा लगता है ।

***रमेश मिश्र
23,नागरदास पटेल चाल,रखियाल.
अहमदाबाद .380021

है अँधेरा बहुत सितारे बनो,
डूबतों के लिए किनारे बनो,
बेसहारे बहुत हैं दुनियाँ में ,
तुम सहारा न लो,सहारे बनो ।

(रवीन्द्र जैन)
रजनीकान्त शुक्ल के सौजन्य से ।