Sahityayan

Monday, 21 October 2013

मेरे ताज़ा दोहे

               
                 मेरे ताज़ा दोहे

राजा घर बेटा हुआ  तो वह राजकुमार
बेटी जन्मी ़, चाहिये  उस को राजकुमार ।
       ऐसे राजकुमार अब  जिन के पास न शक्ल
       शक्ल छोड़िये अगर हो थोड़ी सी भी  अक़्ल ।
चाँद चाहिये दिवस में  इतनी ऊंची चाह
चमचे भी तैयार हैं   कहें वाह जी वाह ।
       पढ़ विदेश से आ गये  पढ़ा न एको पाठ
       मगर देखते ही बने   उन के ठाठम ठाठ ।
एक योग्यता बस यही  वे रानी के लाल
राजनीति के घाघ को   कर दें चट्ट हलाल ।
       दलदल धनबल साथ लें जिधर चलें जयकार
       जनता सड़कों पर खड़ी  करती हाहाकार ।
भैया यह जनतन्त्र है  धनवालों का खेल
तन्त्र शेष पर जन कहाँ  उस की छूटी रेल ।
        उस का कुछ बिगड़े नहीं  गिनो गिनाओ खोट
        भ़ष्टाचारी हो बड़ा  दिलवाएगा  वोट ।
गधे पंजीरी खा रहे  क्यों कलपावै  जीव
दाल भात को खाय कर  ठण्डा पानी पीव ।
       अपना ही तो राज है  चले गये अंगरेज़
       ये देसी अंगरेज़ पर  उन से निकले तेज़ ।
नौकरशाही मस्त है  बस अंगरेज़ी  बोल
चाहे कितना पीट ले  तू हिन्दी का ढोल ।

     

           कुछ पहले दोहे

कल  कल करते कल गया  कल पाई क्या आज
कल जितना बेकल रहा  उतना बेकल  आज  ।
      कलि युग क्या कल युग यही  पल पल विकल ज़हान
       कल कल करते दिन गया  अविकल विकल  विहान ।
कल युग पटरी पर सदा  दौड़ी  जीवन रेल
हंस लो मिल रोओ बिछुड़   कुछ घंटों का ंखेल ।
       यह बौना गोरखपुरी   यह बलिया का जाट
       सब हिन्दी को चर रहे क्या बांभन क्या जाट ।
यह चाचा गोरखपुरी  यह बनारसी बाप
संसद में इंग्लिश बकै   बाहर हिन्दी जाप ।
         दिल्ली या परदेश में   हिन्दी की जय बोल
         गंगा जल में पर कभी लेता  व्हिस्की  घोल । ।
जीवन ख़ाली कुम्भ सा   सूखा सारा नीर
जर्जर डाली पर िटका    सूखा  पात शरीर  ।
     यौवन मद में मस्त हो  जर्जर ज़रा न भूल
      ज़रा पवन आ एक दिन    झाड़ेगा सब धूल ।
अपनी सुषमा गन्ध पर   चाहे जितना फूल
माली आ ले जाएगा      खिले ंअधखिले  फूल  ।
      रात गई दिन आ गया  दिन बीता फिर शाम
      कोल्हू  में चलता रहा    पहुँचा  किसी न धाम ।
--सुधेश
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