Sahityayan

Saturday, 2 November 2013

मैं ने लन्दन में भारत देखा

   मैं ने लन्दन में भारत देखा

यह शायद अजीब लगे, पर लन्दन भारत को बेहतर समझने में मेरी मदद करता है,  और भारतीय वास्तविकता की कई विशेषताएं मेरे लिएअब और स्पष्ट हो गयीं हैं. लन्दन बड़े भारतीय शहरों जैसा है, ख़ास तौर पर वह मुंबई के समान है: हर जगह में चमकदार रंग, अनेक पोस्टर,सूचना-पट्ट, स्टिकर, बड़ी और छोटी दुकानें और अवश्य ही बहुराष्ट्रीय समाज जिस में  दक्षिण एशिया की आप्रवासियों की एक बड़ी संख्या शामिल हैं. किसी कारण से यहाँ पर भारतीय लोग पाकिस्तानी, बंगलादेशी और श्रीलंका लोगों से काफी कम हैं: विश्वविद्यालय को छोड़कर लन्दन के रास्तों पर मुझे सिर्फ दो-एक भारतीय अभी तक मिले. अनगिनत दुकानों में अन्य दक्षिण एशिया के लोग ही काम करते हैं, जो एक प्रश्न उठाता है: भारतीय लोगों की संख्या क्यों सब से कम है?

मैं लन्दन में जैन और थेरावदा बौद्ध धर्मं में म.ए. कर रही हूँ, और एक विद्यार्थी के हैसियत से मैं ने समझा कि भारतीय विद्यार्थियों की तरह यहाँ के अन्यथा विद्यार्थी बहुत सक्रिय हैं: वे अलग-अलग संगठनों का निर्धारण करते हैं, सरकार के प्रकाशित हुए कानूनों का विरोध करते हैं,दुनिया में न्याय को विस्तृत करने का रास्ता ढृढ़ते  हैं, विभिन्न विषयों पर बैठकों और प्रदर्शनों की व्यवस्था करते हैं.।
भारत में पढ़ते हुए मैं हर बार चकित होती थी जब विद्यार्थियों की रैली की वजह से कक्षाओं को रद्द कर दिया जाता था, क्यों कि रूस में ऐसानहीं होता है: छात्रों को कोई भी रैली निकालने नहीं दे जाते हैं. छात्र खुद काफी निष्क्रिय हैं, और आम तौर पर दुनिया के मामलों मेंदिलचस्पी नहीं लेते हैं. अब मैं यह समझती हूँ कि जवानों की यह गतिविधि अपने अधिकारों को दृढ़ करने और उच्च संरचनाओं तक अपना संदेश पहुँचाने की एक बहुत प्रभावी तकनीक है. अफ़सोस की बात यह है कि, रूस में जवान लोग अपने विचार और दृष्टिकोण सरकार को व्यतीत करने की चेष्टा नहीं रखते हैं. शायद इसी कारण से रूस में वर्तमान मैं लोकतंत्र नहीं है, और भविष्य में भी होने की कम उम्मीद है.।

लन्दन भी मुंबई की तरह दुस्साहसी है, जैसे कि लोग सफाई का ज्यादा ध्यान नहीं रखते हैं. यहाँ पर बहुत कम कूड़ेदान हैं. इस के आलावा लन्दन में लोग सड़क को लाल बत्ती पर पार करते हैं.।

लन्दन की स्वतंत्रता के वातावरण ने भी मेरी मुंबई की याद दिला दी है. मोस्को और सैंट पीटर्सबर्ग के नगरों में काफी सामाजिक दबाव है,लोगों के व्यवहार पर, कपड़ों की शैली पर और कभी-कभी उन के विचारों पर भी. भारत में मैंने देखा है कि पूरी दुनिया से अन्य प्रकार के लोग आते हैं, और मुम्बई सब और सभी को स्वीकृत करता है. इस का परिणाम यह है, कि इस शहर में हर एक किस्म की संस्कृति, धर्म,परंपरा, भाषा, राष्ट्रीयता, आदि का मेल है.  वास्तव में मास्को में, किसी भी दुसरे बड़े शहर की तरह, यह देखने को मिलता है, लेकिन किसीअज्ञात वजह से मास्को में सभी के स्वीकरण की प्रवृत्ति दिखाई नहीं देती है. इस के विपरीत, वहां का वातावरण ज्यादा तनावपूर्ण होता है,तथा लोग आपस में नहीं घुलते-मिलते, लेकिन अधिक से अधिक समुदाय पर बांटे जाते हैं.।

इस के अतिरिक्त, लन्दन और मुंबई के लोग मोस्को लोगों से ज्यादा मिलनसार होते हैं, जैसे सभी एक दुसरो से नमस्ते करते हैं और लाइन में खड़े हुए बात करने लगते हैं, मास्को में आज यह बहुत कम मिलता है: लोग ज़्यादातर अपने मोबाइल में व्यस्त करते हैं या किताबें पढ़ते हैं,लेकिन आपस में मिलते नहीं.।

हालांकि भारतीय मुंबई और इंग्लिश लन्दन में अंतर भी हैं, जैसे लन्दन में विद्यार्थी अपने अध्यापकों से लगभग बराबर जैसे हैं, और संकाय बैठकों में वे एक साथ उठते-बैठते हैं और विभिन्न विषयों पर बात करते हैं. इस संबंध में, रूस मध्यस्थल पर है, क्योंकि वहां एक कठोर पदानुक्रम नहीं है, जो भारत में है, लेकिन उसी समय हम शिक्षकों के साथ पार्टी में जा नहीं सकते.।

इस प्रकार मैं यह कहना चाहती हूँ, कि लन्दन में रहते हुए, मैं हमेशा भारत के बारे में सोचती हूँ, क्योंकि आज दुनिया बहुत छोटी हो गयी,और सब कुछ मिश्रित हो गया.।

--  शाशा गोरडीवा
    ( रूसी महिला )
Russia& India Report में १२ अक्तूबर २०१३ को प़काशित ।
अनिल जनविजय के सौजन्य से ।