Sahityayan

Saturday, 24 January 2015

रोचक प्रसंग

रोचक प्रसंग 

अमर कान्त का पुण्यस्मरण 

अमरकांत का असली नाम श्रीराम वर्मा था। वे तब आगरा में पत्रकार थे। वे डॉ. रामविलास शर्मा से अक्सर मिलने जाया करते थे। डॉ. शर्मा उन्हें अपने साथ शहर में होने वाली प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में ले जाया करते थे, जहां वे किसी की गजलें सुनाते थे। एक दिन उन्होंने इस गोष्ठी में किसी की लिखी कहानी सुनी तो उन्हें महसूस हुआ कि ऐसी कहानी तो वे खुद भी लिख सकते हैं। घर आकर उन्होंने कहानी लिखी, जिसका शीर्षक था ‘इंटरव्यू’।

अगली गोष्ठी में अमरकांत ने कहा, ‘नहीं मैं आज एक कहानी सुनाऊंगा।’ उन्होंने अपनी कहानी सुनाई। तब राजेंद्र यादव भी अपने शहर आगरा में रहते थे। अमरकांत की इस कहानी को सुनकर डॉ. शर्मा ने राजेंद्र यादव से कहा- ‘तुम ऐसी कहानी नहीं लिख सकते।’ डॉ. शर्मा की यह टिप्पणी अमरकांत को प्रेरित कर बाद में किसी कहानी-प्रतियोगिता में अपनी कहानी ‘डिप्टी कलेक्टरी’ भेजी, जो पुरस्कृत हुई। इस तरह अमरकांत कथाका बने। 

विश्वनाथ त्रिपाठी का संस्मरण 
जय प्रकाश मानस के सौजन्य से ।

भूखी पीढ़ी की कविता 

अनिल करनजय (27 जून 1940 - 18 मार्च, 2001) एक पूर्ण भारतीय कलाकार थे । 1960 के क्रांतिकारी के दौरान, अनिल करनजय भारतीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलन में सबसे 'आगे थे। 1962 में, करुणानिधान मुखोपाध्याय के साथ उन्होंने संयुक्त कलाकारों की स्थापना की। उनके स्टूडियो के नाम 'शैतान की कार्यशाला' ने पूरे भारत और विदेशों के कलाकारों, लेखकों, कवियों और संगीतकारों को आकर्षित किया। 

अनिल करनजय कवियों के एक प्रसिद्ध कट्टरपंथी बंगाली समूह भूखी पीढ़ी के एक बहुत सक्रिय सदस्य रहे, जिसे भूखवादी হাংরি আন্দোলন आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है । जब एलन गिन्सबर्ग और पीटर ओर्लेवोस्की ने अपने भारत प्रवास के दौरान भूखवादियों से बातचीत की उस समय अनिल बीट जनरेशन से जुड़े थे। भूखवादी पटना, कोलकाता और बनारस में आधारित थे और उन्होंने नेपाल में अवान्त गर्दे के महत्वपूर्ण संपर्कों के साथ भी जालसाजी की। अनिल ने भूखवादी प्रकाशनों के लिए अनेक चित्र बनाए. उन्होंने पोस्टर और कविताओं का भी योगदान दिया। और वे भारत में लघु पत्रिका आंदोलन के एक संस्थापक थे। 1969 में, वे नई दिल्ली चले गए जहां उन्होंने दिल्ली शिल्पी चक्र में एक 'लघु पत्रिका प्रदर्शनी' आयोजित की और उसमें भाग लिया।

-- जय प्रकाश मानस 

पंत को क्यों घूरा करते हो
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सुकुमार कवि सुमित्रा नंदन पंत एक बार निराला के असामान्‍य व्‍यवहार से परेशान हो गये थे। परेशान क्या लगभग डर से गये थे । उन्‍होंने निराला के कुछ परिचित लोगों से शिकायत की कि निराला उनके मकान के पास छुप कर सुबह-शाम उन्‍हें जाने क्यों-घूरा करते हैं। मुझे बहुत डर लगता है।
लोगों ने उन्हें समस्या का हल बताते हुए कहा कि आप यह सब महादेवी वर्मा जी से कहते । निराला जी एक मात्र महादेवी जी की ही बात मानते है। अन्‍य किसी में उनसे कह पाने की हिम्‍मत ही कहाँ है?
पंत जी ने वैसा ही किया ।
महादेवी जी ने निराला से कहा - ''तुम पंत को देखते क्‍यों हो भई। डर के मारे उसे नींद नहीं आती।''
''निराला ने कहा वह मुझे सुंदर लगता है।''
कहते हैं इसके बाद महादेवी जी के मना कर देने पर निराला जी ने पंत जी को घूरना बंद कर दिया ।
-- जय प्रकाश मानस के सौजन्य से ।

विजय की प्रसन्नता लिए जब नेता जी, गांधी जी के पास पहुंचे तो वे मीडिया से मुखातिब हो कह रहे थे- 'यह व्यक्तिगत रूप से मेरी हार है.'...बोस स्तब्ध रह गए. फिर जिस तरह से कभी कमिश्नर के पद से उन्होंने इस्तीफ़ा दिया था उसी त्यक्त भाव से उन्होंने कांग्रेस को अपना इस्तीफ़ा दे दिया.
..उसके बाद कांग्रेस के सैकड़ों अध्यक्ष बने पर सुभाष चन्द्र बोस कोई नहीं बन पाया...
एक त्यागी अमर भले न हो पाए पर जीवन-मुक्त वह जरूर हो जाता है...
उनको नमन .....
( सर्वेश सिंह के सौजन्य से ) 
जे एन यू में मेरे पूर्व छात्र ।