Sahityayan

Sunday, 16 August 2015

रंजना अनुराग की कविताएँ

         लखनऊ की कवयित्री    रंजना अनुराग लगभग चार दशकों से कविता   , कहानी , लेख 
         आदि लिख रहीं हैं ।   उन के दो काव्यसंग्रह ( रजनी कन्धा , परिन्दे ) और कहानियों का संग्रह 
         ( स्वयम् सिद्धा )    आदि छप चुके हैं ।  संचार माध्यमों पर भी उन की उपस्थिति यदा कदा 
         दिखाई देती है। वे लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच डी उपाधि प्राप्त कर चुकी हैं ।
         वे फेस बुक पर भी सक्रिय हैं । 
         उन की कुछ कविताएं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । 
        ---  सुधेश 

       स्त्रियाँ

स्त्रियाँ
सदियों से पहनती है आभूषण
चूड़ी/बेंदी/पायल/बिछुए
और लगाती है बिंदी/सिंदूर
इन्हीं प्रतीकों के मध्य विचरती है
जन्म भर ....
और सवेरे शाम उलझती है पतंगो सी
नाना व्रत/त्यौहार/रस्मों-रिवाज
मांगलिक कार्यो/उत्सवों की
महीन काँच से लपेटी गयी डोर से /
माँझे से
वे स्त्रियाँ महज बेजान कठपुतलियाँ  थी
जिन्हें रंगीन धागे में बांध कर
जीवन भर नचाते रहे उनके पुरुष बाजीगर...
कंचे गोलियों सी रंग बिरंगी
इंद्रधनुषी सपनों  से भरी उनकी आँखे
कब आँसुओं से लबालब भर जाती है जवान होते ही
उन्हें समझ नही आता या वे समझना नही चाहती
ओखल/ मूसल/ बेलन/बट्टो के तिलिस्म में ही
खट-खट कर रह जाती है तमाम उम्र
गवाँ देती है यौवन के सुनहरे साल
बस बची चन्द कमजोर साँसों से ही
उनके जीवित रहने का प्रमाण मिलता है
कभी किसी ने नही थमायी
उनके हाथो मेँ कलम और तलवार
नही समझी गयी उनमे कोई शक्ति /कोई योग्यता
नही थी वे शतरूपा /शक्ति रूपा कभी भी
किसी के लिए
दुर्गा/ चामुण्डा/ सरस्वती और काली किसी युग में
वे लोपा मुद्रा /गार्गी/ मैत्रेयी और अपाला भी नही थी ...
किसी  शास्त्र ने /किसी मनु ने
नही दिए उन्हें कोई अधिकार
नारी मुक्ति महज एक नारा है आज भी उनके लिए
उनके प्रतीको को/अर्धनग्नता के पोस्टरों को
चिपकाती रही वे अपनी देह पर
वे सजाती रही देवालयों को/भग्न खण्डहरों को
अपनी काम गन्धा देह के उपकरणों से
भाषायी कलेवरों के वीभत्स
अंग प्रदशनों का लिखती रही अध्याय
सर्गों/उपसर्गों को बाँचती रही
स्त्री मुक्ति का छलावा उन्हें  पारदर्शी देह के
पार ले जाता रहा .....
वे प्रस्तर मूर्तियो सी
युगों के अभिलेखागार में जमा की जाती रही
निर्वाक/ निर्विरोध /निशस्त्र
चुना गया उन्हें सदा ही
मलिन लालसाओं/वासनाओं की पूर्ति हेतु
आजन्म दासत्व हेतु ....
पर वे इसे अपना सौभाग्य मानती रही
सिद्ध हस्त हाथ द्वारा बुने जाल में
वे छटपटाती तो रही
पर मुक्ति की कभी चेष्टा नही की
उनके स्वामी बड़ी सहजता से उनका वस्त्र हरण करते रहे
हर सदी में /चौराहों /गली/मोहल्लों /बाजारों में
उन्हें रफूगर समझते हुए अपनी बेशर्मियों पर उन्ही से
पैबन्द लगवाते रहे
उनकी कच्ची मिट्टी की  गीली उम्मीदों में
उन्हें ही दफन करते रहे ...
वे स्त्रियाँ जिन्होंने कभी उफ़ भी नही की
बेशक अब उनके अन्नदाता /खरीदार भौचक्क है
कि उन्ही स्त्रियों ने थाम ली है कलम और तलवार
दोनों
बड़ी कुशलता से सीख लिया है लड़ना और वार करना
मोर्चो पर निडर /निर्भ्रांत सी खड़ी है/ डटी है
उन्हें कवि  और कहानी कार के महीन जालों में भी पनपना
सिखा दिया है
औपन्यासिक मनगढन्त कथानकों को सत्य की आंच में तपाना
और कसौटी पर कसना सिखा दिया है
वे दहशत गर्द अब अपनी सारी ताकतों को चारो कोनों से बटोर कर
पुरजोर हमला वर है ..
उन स्त्रियों को रौंदने /झोंकने /हाँकने को तत्पर है दोजख की  आग में
ताकि वे फिर से बेजुबान हो सकें
उसी तरह कमअक्ल/बाअदब
जिसे वे इस्तेमाल में लाते रहे
अपनी सुविधा नुसार /स्वादानुसार...
उन्हें खाँचो में कैद करने की नाकाम कोशिशें जारी है
लगातार ...
वे आये दिन बसों में/कारों में/घरों में/ स्कूलों /कारखानों में
सड़कों/दफ्तरों में कुचली जा रही है
इन अचीन्हे /अबूझे दरिंदो के लिजलिजे हाथ
कपडों की तरह लिपटते जा रहे है ....
फैलते जा रहे है ....
उन्हीं स्त्रियों के वजूद के आस पास बेसाख्ता
उन्हें शिकंजे में कसने के लिए
हर बार ....

         कलम की आज़ादी !

उस पार
दीवार तनी है
कुछ नामचीन प्रकाशको /लेखकों/संपादकों
और जिद्दी पाठकों की/असहमति/अस्वीकृति
और उपेक्षाओ के
संघाती प्रहार जारी है...
टेढ़ी भृकुटियों के साथ ही
अहंकारी आलोचकों की श्वेत बगुला पंक्ति
हमलावर है
वे किसी नयी सोंच को/नवांकुरों को नही  डालते घास
कुकर मुत्ते की तरह गली/मुहल्ले में रोज
उगते /उभरते नवोदित कवि /कथाकारों को
तिलिस्मी शब्दों के शातिर खिलाड़ी
नव लेखन के धुर विरोधी
अपनी अभेद्य लामबन्दी का / अमोघ अस्त्र का
करते है अचूक प्रयोग
पूरी ताकत से
पँक्ति बद्ध/कतार बद्ध/मनाहियों/
अस्वीकृतियों के बोझ तले
दब कर कुचल जाती है हजारों अद्वितीय संभावनायें /प्रतिभाएं
'खेद सहित वापसी 'के गठ्ठर की
विचलित करती स्थितप्रज्ञता...
पर उफनती नदी की  बाढ़ सी जुनूनी कुछ दस्तकें
अभिव्यक्ति के भाषायी संवेदी कलेवर
कुछ अभिधाये/ लक्षणायें / व्यंजनायें
कठोर बर्फ को भेद कर निकली जलधार सी
कभी-कभी फूट ही पड़ती है
गढे गए संसाधनों के नए प्रतिमानों  के साथ
आ ही जाती है तब नयी हवाएँ /नए लोग
बुर्जुआ जिद के टूटते तट बन्ध को
जो बहा ले जाते है
पूरी शिद्दत से /तोड़ देते है छद्म सदाशयता का आवरण
मनहूस खण्डहरों की एक-एक ईंट
और गुल मोहर के दरख्त तब दूर तक नारंगी/
केसरिया परिधान ओढ़ लेते है
पनपते है जो कड़ी चट्टानों पर दूब की तरह
काईयों से भरे दलदल में धँस कर
ढूंढ़ ही लाते है अपने हिस्से का कमल
और परवाह किये बिना ही किसी परख और पैमाइश की
दिगभ्रमित मूर्धन्य महाशयों के/ पुरस्कृत माननीयों के
स्वांग भरते संकीर्ण स्थापनाओं की
छा जाना चाहते है धवल आकाश में
उनके हौसलोंके पंख सच में बहुत मजबूत होते है
इरादों की ठोस जमींन पर
बड़ी हिम्मत से लिखी है
जिन्होंने अपने वजूद की इबारत
वे अब जाना चाहते है उस दीवार के पार
जहाँ उनके कलम की आजादी
उनका इंतजार कर रही है । 

            वक्त की आहट !

तुम्हारे शब्द
तलवार की तरह काट देते है
मेरा अंग-अंग
बघनखे की तरह छील देते है मेरी अंतरात्मा
और उन घावो पर तुम्हारी कुटिल हँसी
तीखे तेजाब की तरह जेहन में उतरती है
चीर देती है मेरे जिस्म को आर-पार
पर तुम शायद भूल गए हो कि
वक्त कभी किसी का सगा नही होता
आज तुम्हारे साथ है कल मेरे साथ
खड़ा होगा
किसी विशाल वृक्ष को काटने से नही
खत्म होती उसकी विरासतें
उसके पनपने की संभावनायें
जड़ों में कभी उपयुक्त अवसर पाकर अंकुरण फूटेगा
फिर शाखाओं/कोपलें और फुनगियों के
घने छतनार विकसेंगे
जिसकी भरपूर छायायें मीलों पसर जाएँगी
हजारो हजार परिंदों का घर
उसके कोटरों में घनीभूत छाया में होगा
लेकिन तब तक तुम्हारी हवेलियाँ
खण्डहर बन चुकी होंगी
और विवश होकर
अपने जलते वजूद को दफनाने
इस छाया दार वृक्ष के नीचे तुम्हें आना ही पड़ेगा
फिर मैं लौटूंगी किसी दिन
किसी समय /किसी जन्म में तुम्हारा उधार चुकाने
तुम्हें तुम्हारी पीड़ा से अवमुक्त कराने
और तभी होगा
इस प्रहसन का पटाक्षेप
तुम्हारी और मेरी दोनों कई पीड़ा का अंत ।


           नदी बहती है !

अहन्मन्यता के
अहंकार के पहाड़ो को
पार करती बहती है नदी
सौम्य शीतल जलधार
विरोधो/ अन्तर्विरोधों/ बाधाओं को
ठेलती/ परे धकेलती
फूटती है रसधार
निर्बाध/ निरंतर
विसंगतियों /वैमनस्यताओं के
दुर्गम पठार को करती दर किनार
उत्तल उदधि के फेनिल तट
लहरो के कलरव /चञ्चल
अन्तर सी निर्मल
झर-झर बहती रहती है
नदी प्रेम की बहती है
कल-कल
छल-छल ।

         बौने होते गीत

शब्दों के कंजूस कहार
जब नही ढो पाते
संवेदना की पालकी
तब गीत ठूँठ हो जाते है
और कविता की जमीन बंजर
हो जाती है
मगर निरंकुश दर्द की उद्दाम
बिछलन को रोक कर
हमे एक बाँध बनाना ही होगा
वरना कतरा-कतरा बहती नदी रोक पायेगी
अपने अजन्मे शिशु के गर्भपात को
नदी का/ जंगल का होना
हमारे होने से भी ज्यादा जरूरी है
हमारी पीढ़ियों का जिक्र
तवारीखों में तब्दील हो
उससे पहले
हमे अपनी संवेदना /अपना दर्द/अपना अंश
बचाना ही होगा
निपटना होगा
उन मनहूस दुराशाओं/ दुरभिसंधियों से
जो हवा पानी/ नदी /जंगल/ जमीन और पहाड़
सबके खिलाफ लाम बन्द हो रही है । 
--- रंजना अनुराग 
C/ 172निराला नगर 
लखनऊ 206020 




             







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