Sahityayan

Saturday, 9 January 2016

उर्मिल सत्यभूषण की संगति में कुछ क्षण

                 उर्मिल सत्यभूषण की संगति में कुछ क्षण 

   उर्मिल जी को मैं ने पहलेपहल दिल्ली के रूसी सांस्कृतिक केन्द्र में देखा , जहाँ उन्होंनें 
परिचय साहित्य परिषद के तत्वावधान में एक गोष्ठी का आयोजन किया था । यह लगभग 
पन्द्रह बीस वर्ष पहले की बात है । अवसर था ज्ञानचन्द्र गुप्त के काव्यसंकलन के लोकार्पण 
का । गुप्त जी ने मुझे वहाँ कुछ बोलने के लिए आमन्त्रित किया था । तब उर्मिल जी को 
कार्यक्रम की संयोजक के रूप में देखा । पता चला कि वे परिचय साहित्य परिषद को विगत 
कई वर्षों से चला रही हैं । उन की संयोजन क्षमता और साहित्य में गहरी रुचि का पता मुझे 
उस दिन मिला था । उस गोष्ठी की अध्यक्षता डा रामदरश मिश्र ने की थी । पुस्तक लोकार्पण 
के बाद एक कविगोष्ठी भी हुई थी , जिस में उर्मिल सत्यभूषण आदि कवियों को सुना था । 
मैं ने भी उस में अपने कुछ दोहे सुनाये थे । 
    परिचय साहित्य परिषद की गोष्ठियाँ रूसी सांस्कृतिक केन्द्र में हुआ करती थीं , पर 
मुझे शायद दुबारा उस की गोष्ठी में जाने का अवसर नहीं मिला । शायद इस कारण कि 
मैं उक्त परिषद का सदस्य नहीं था । 
    समय बीतता रहा । मैं सेवा निवृत्त हुआ पर साहित्य से तो किसी रचनाकार को निवृत्ति 
या मुक्ति नहीं मिलती । उर्मिल जी की गतिविधियों का पता मुझे परिचय साहित्य परिषद 
की गोष्ठियों की समाचारपत्रों में प्रकाशित रपटों से मिलता रहा । 
    कुछ बातें समय खुद निश्चित करता है , यद्यपि समय एक अवधारणा है , जो हमारे 
मनों में रहती है । समय ने ही मुझे उर्मिल सत्यभूषण जी से लम्बे अन्तराल के बाद १४ 
अक्तूबर २०१५,को संसद के कक्ष में आयोजित एक कार्यक्रम में मिलाया , जिस की 
सहसंयोजक वे खुद थी और उन के साथ श्रीमती सन्तोष खन्ना भी थीं । यह कार्यक्रम 
संसदीय हिन्दी समिति , परिचय साहित्य परिषद और विधिभारती परिषद के संयुक्त 
तत्वावधान में आयोजित हुआ था , जिस में कुछ साहित्यकारों को राष्ट्रभाषा गौरव 
के सम्मान से सम्मानित किया गया था ।
   उक्त कार्यक्रम में मैं ने श्रीमती उर्मिल सत्यभूषण का लम्बा वक्तव्य सुना , जिस से मैं 
उन की सक्रियता और साहित्य से गहरे लगाव के रूबरू हुआ । वे इस कार्यक्रम में 
बंगलौर से आईं थीं , जहाँ आजकल वे अपने परिवारजनों के साथ रहती हैं । 

                                                          २
    कुछ दिनों पहले दिल्ली की मासिक पत्रिका " अभिनव इमरोज " का नवीनतम 
अंक देख रहा था , तो उर्मिल जी के एक संस्मरण पर नज़र पड़ी   , जिस का शीर्षक 
चौंकाने वाला था । वह है " मैं ने तो इंडिया जा के मरणां है  " । मेरे चौंकने का एक 
कारण यह था कि कहीं उर्मिल जी विदेश तो नहीं पहुँच गईं , जहाँ से वे लिख रही हैं 
" मैं ने तो इण्डिया जा के मरणां है "। शीर्षक में पंजाबी की गन्ध है , जो स्वाभाविक 
है , क्योंकि वे स्वयम् पंजाबन हैं । संस्मरण विदेश में रहने वाली उन की भाभी का है ,
जो अपने देश भारत के लिए तड़पती रहीं और जिन की अन्तिम इच्छा थी  कि " मैं ने 
इण्डिया जा के मरणां है " । आख़िर में वे पंजाब में कहीं अपने मायके में मरीं । 
      यह संस्मरण अमेरिका की उन की यात्रा का संस्मरण है ,तो इसे यात्रा संस्मरण 
भी कह सकता हूँ , और पत्रिका के सम्पादक देवेन्द्र बहल ने भी इसे यात्रा संस्मरण का ही 
शीर्षक दिया है । इसे पढ़ना शुरु किया तो पूरा एक साथ पढ कर समाप्त किया । 
कारण है इस की रोचकता और उर्मिल जी की वर्णन शैली । कहा जाता है कि गद्य 
कवि की कसौटी है । इस कसौटी पर उर्मिल जी खरी उतरती हैं । मैं उन्हें कवयित्री 
के रूप में पहले से जानता आया , पर यह यात्रा नुमा संस्मरण पढ कर पक्का यक़ीन 
हो गया कि वे सफल गद्यलेखिका भी हैँ ।
       मैं इस मार्मिक संस्मरण से और उन की भाभी की मनोदशा के मार्मिक चित्रण 
से इतना प्रभावित हुआ कि मैं ने उसी दिन कुछ क्षणों के बाद ये दोहे लिख डाले -- 
       भारत का यह ख़ून हे अपनी भाषा वेश 
       जीना है तो देश में मरना है तो देश । 
         निज भविष्य की खोज में  आ पहुँचा परदेश 
     बहुत रहा परदेश में मरना अपने देश ।
ये दोहे उसी दिन में ने टेलीफ़ोन पर उर्मिल जी को सुनाये , तो सुन कर   खिल उठीं 
और बोलीं कि मैं इन्हें " ट्रयू इंडिया " नामक पत्रिका को भेज दूँ , क्योंकि इस के 
सम्पादक ओम प्रकाश जी उन पर विशेषांक प्रकाशित कर रहे हैं । तो मैं ने सोचा कि 
दोहों के साथ उन की पृष्ठ भूमि भी देनी चाहिये । पाठकों को पता चले कि मार्मिक 
रचना संवेदन शील व्यक्ति को कैसे प्रभावित करती है । मेरे दोहे किसी को प्रभावित 
करें या न करें , पर ये इस बात का प्रमाण तो हैं ही कि उर्मिल जी की मार्मिक रचना 
ने मुझ से इन्हें लिखवा लिया । 
      
                              ३ 

  एक और बात बता दूँ कि उस दिन उर्मिल जी ने टेलीफ़ोन पर अपने कुछ शेर 
सुनाये ( वह भी डायरी देख कर नहीं ) जो इस बात के प्रमाण हैं कि वे अच्छी 
गजलगो शायरा भी हैं । वे शेर पढ़िये -- 
      मेरे आकाश पर छाये उदासी के घने बादल 
       मैं चुटकी से उड़ा दूँगी मुझे मौसम बदलना है ।
        मेरे शब्दों के लोहे को अभी ख़ंजर में ढलना है 
       अभी से क्या बता दूँ कि किस का सर उतरना है । 
इतने अच्छे शेर कोई पुष्ट कवि या कवयित्री ही लिख सकती है। 
    मैं ने उन से कहा कि अपना काव्यसंग्रह या गजल संग्रह भेजिये । तो वे 
बोली " अवश्य भेजूँगी और अपनी आत्मकथा भी भेजूँगी " । कुछ देर रुक कर 
बोलीं " देवेन्द्र बहल जी ने कहा है कि वे पुस्तकों से पाठकों को परिचित 
कराएँगे  वे मेरे प्रशंसक लगते हैं।  " । 
   फ़िर टेलीफ़ोन पर उन्हों ने सूचना दी " आप कल लोदी रोड पर हैबिटैट 
सेन्टर आइये  । वहाँ मेरी एक कहानी का मंचन होगा " ।
मैं सोचने लगा लो जी इस उर्मिल नाम की नारी के कितने रूप हैं। 
मैं उन्हे केवल कवयित्री समझता था । " अभिनव इमरोज " का अंक पढ कर 
जाना कि वे यात्रा वृत्तान्त और संस्मरण भी लिख चुकी हैं ।  आज यह भी जाना 
कि ने कहानियाँ भी लिखती हैं । उन की कहानी मंचन के लिए चुनी गई । यह 
तभी सम्भव हुआ कि उस में कुछ नाटकीय तत्व हैं । 

                                    ४
    यह भी बता दूँ कि उन से ही पता चला कि उन के घर में सब पंजाबी बोलते 
थे   पर वे शुरु से हिन्दी की प्रेमी हैं । तेरह वर्ष की आयु में उन्हों ने तुकबन्दी 
शुरु कर दी थी । में अभागा हूं कि उन से मेरा परिचय कुछ देर से हुआ और उन 
के साहित्य से बारे में लगभग अनजान हूँ । पर उन्हों ने कहा था कि वे मुझे अपनी 
कुछ पुस्तकें भेजेंगी , क्योंकि वे मुझे अपना बडा भाई समझती है । उन के अग्रज 
और मेरी जन्मतिथि संयोग से एक है । 
     अब ट्रय्ू इंडिया को अपने दोहे भेजने के बहाने इतना बहक गया । 

डा सुधेश 
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैक्टर १० 
दिल्ली ११००७५ 
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