Tuesday, 20 March 2018

नवगीत परम्परा

-मित्रो, नवगीत विमर्श पर मेरा यह आलेख लगभग एक दशक पूर्व लिखा गया था। कृपया इस पर अपना स्पष्ट मंतव्य देकर इस विमर्श को आगे बढ़ायें -

नवगीतः मेरी आत्मा की अंतर्साधना
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कविता की रचना प्रक्रिया का प्रश्न मनुष्य की आदिम सर्जना क्रिया से जुड़ा हुआ है। जिज्ञासु होकर जब पहली बार मनुष्य ने सृष्टि की सहज क्रियाओं को सहजानुभूति और एक सुखद अचरज भाव से अवलोका होगा, तभी संभवतः कविता के प्रथम वाक्यांशों, यथा - सूरज का उगना, उसका डूबना, हवा का मंद-मंद बहना या तूफानी होना, झरनों का झरना, नदी का कलकल करते प्रवाहित होना, पूनो के चाँद का हँसना, बरखा की रिमझिम, बिजुरी की दमक, पत्तों की सरसर या टपकन आदि का स्वतः ही प्रस्फुटन हो गया होगा। कालान्तर में इनमें से अधिकांश सृष्टि-क्रियाएँ रूढ़ होकर अपने काव्य-एहसास को खो बैठीं। किन्तु इन सृष्टि-क्रियाओं से ही उपजीं कई नई काव्यानुभूतियाँ भी जनमीं और इस प्रकार मनुष्य की कविता यात्रा नित नये रूप, नई आकृतियों से रूबरू होकर अग्रसर होती रहीं।

आज का समय जटिल प्रसंगों का है और इससे भाव-संज्ञान भी जटिल हुए हैं एवं इसके साथ काव्यानुभूति भी आज जटिल हो गई है। कविता की रचना प्रक्रिया की जब आज हम बात करते हैं, तो हम उन बौद्धिक दबावों को नज़रन्दाज नहीं कर सकते, जो सामूहिक अवचेतन के आदिम एहसासों से जुड़कर एक नये भाव-बोध की सृष्टि करते हैं। कविता क्योंकि मनुष्य की अनन्त भाषा सर्जना की सबसे परिष्कृत उपज है, उसमें भाव एवं विचारों का अमित गुम्फन संभव है। किसी कविता के जन्म से पूर्व की जो भावस्थिति होती है, उसको गूँगे के गुड़ की तरह महसूसा तो जा सकता है, किन्तु व्यख्यायित नहीं किया जा सकता।

जहाँ तक मेरी अपनी रचना प्रक्रिया का प्रश्न है, मुझे लगता है कि भीतर अवचेतन में पहले एक अस्पष्ट भाव-संज्ञान घुमड़ता है, जो एक या कई समानधर्मा समांतर अनुभवों से प्रेरित होता है। कई बार उन अनुभवों का अन्योन्याश्रित कोई सम्बन्ध भी नहीं होती। नदी की मेरी अनुभूति मेरे शहर लखनऊ की नदी गोमती से निश्चित ही जुड़ी है, किन्तु उसमें तमाम अन्य नदियों, जलधाराओं, जलसमूहों के अनुभव भी सम्मिश्रित हो जाते हैं। नदी मेरी काव्यानुभूति में मात्र एक शब्द या जल-प्रवाह की आकृति नहीं रह जाती।उसमें नदी का पूरा परिवेश यानी नदी के कछार एवं तटबंध, उन पर स्थित कच्चे-पक्के घाट, उन घाटों पर नहाते या पर्व-स्नान करते नर-नारी समूह, उनकी नदी के प्रति श्रद्धा-भक्ति, नदी पर तिरती नौकाएँ, उन पर बैठे लोग, उनकी विविध क्रियाएँ, उनसे उपजे तमाम तरह के स्वर-समूह, जलपक्षियों की कूजें, कभी कहीं सुनी नदीतट की या या नौका पर की वंशीधुन, केवटों और मछेरों के गान और उनकी हाँक, तट पर स्थित मन्दिर की घंटियों की रुनझुन, शंखनाद, आरती के स्वर, मस्जिद की अज़ान की गूँज, नदी में सिराये दीप और तिरतीं पुष्पांजलियाँ, रेती पर पाँवों के निशान, बच्चों के बनाये बालू के घरौंदे, नदी पर बनाआ पुल, उस पर गुज़रते विभिन्न वाहन, किनारे पर की किसिम-किसिम की वनस्पतियाँँ, उनके वासी पशु-पक्षी, कीट-पतिंगे आदि, कवि की नदी से जुड़ी सुख-दुख की स्मृतियाँ, उसका अपना निजी तथा जातीय संस्कार और न जाने क्या-क्या। यानी नदी नदी नहीं रह जाती, वह एक पूरा बाह्य-आंतरिक परिवेश, एक संस्कार हो जाती है। हाँ, इस सारी अवचेतनीय प्रक्रिया के बाद शुरू होती है इन अवचेतनीय बिम्बों के समांतर भाषा-आकृतियों यानी सही लफ़्ज़ों की तलाश। शब्दाकृतियाँ कुछ तो अनायास प्रस्फुटित होती जातीं हैं, कुछ का सायास मंथन होता है और फिर 'गिरा-अर्थ' की 'जल-बीचि' यानी 'कहियत भिन्न न भिन्न' की कीमियागिरी है। वह जब तक संपूर्ण नहीं हो जाती, कवि को चैन नहीं आती। मैं 'आह से उपजा होगा गान/उमड़कर आँखों से चुपचाप/बही होगी कविता अनजान' वाली कविता की रचना प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर पाता। मेरा अपना अनुभव है कि यह एक अनायास-सायास प्रक्रिया है, जो दिखने में अचानक होते हुए भी अचानक नहीं होती। भाव के भाषा-प्रतिबिंब की खोज इतनी सहज नहीं है, जैसा मान लिया जाता है। इसीलिए हर कविता कवि की दृष्टि में अधूरी रह जाती है। कवि की अनुभूति, अक्सर उसे लगता है, अनकही रह गई।

मैंने गीत विधा को अपनी काव्यानुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, क्योंकि मेरे व्यक्तित्व-निर्माण के कालखंड के संस्कार मूलतः गीतात्मक थे। माँ के द्वारा गाईं रामायण की चौपाइयाँँ, पिता के द्वारा हर रविवार की पारिवारिक बैठकों में राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की कविताओं का पाठ, युवा विधुर चाचा द्वारा बच्चन जी के विरह गीतों एवं सहगल के गानों का गायन तथा गली-मोहल्ले तथा परिवार के पर्व-उत्सव प्रसंगों में सोहर-सरिया, कजरी-आल्हा जैसे लोकगायन -- ये हैं मेरे बचपन के संस्कार। बाद में हिन्दी-अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन-काल में भी 'लिरिकल' या गीतात्मक काव्य-प्रसंगों ने ही मेरे अवचेतन को उद्वेलित किया। चित्रकला का मेरा किशोरावस्था का शौक़ भी लयात्मक ही रहा। सुन्दर-सुगढ़ आकृतियाँ एवं ध्वनियाँँ ही मुझे आकर्षित करती थीं। अस्तु, जब मुझे स्वयं काव्य-सृजन की प्रेरणा मिली, तो वह गीतात्मक ही होनी थी। मुक्तछंद की मेरी कविताएँ भी इस गीतात्मकता से अछूती नहीं रह पाई हैं। मेरे तईं कवि होने की पहली और आखिरी शर्त है मनुष्य होना यानी रागात्मक होना। अनुभूति का मूल स्वर मानुषी राग का है और वह गीतात्मक ही होता है।

आज के समय में गीत के प्रासंगिक होने का प्रश्न आज का नहीं है। जब अज्ञेय ने 'तार सप्तक' के दूसरे संस्करण की अपनी भूमिका में युग-संबंध के बदलने के साथ कविता के स्वरूप के बदलने की बात उठाई थी, तभी से इस बात की शंका व्यक्त की जाने लगी थी कि गीतकविता कहाँ तक वर्तमान जटिल जीवन प्रणाली को अभिव्यक्ति दे पायेगी। उस समय गीत का गिने-चुने अपवादों को छोड़कर जो मुख्यतः मंच-आश्रित गलदश्रु कोमल काया-स्वरूप था, उस पर तो यह शंका पूरी तरह मौजूँ बैठती थी, किन्तु उसी कालखंड में 'नवगीत' संज्ञा से अभिहित सुदूर गाँव-गली-खेड़ों-कस्बों में पल-बढ़ रहा गीत एक नई मुद्रा और तेवर के साथ नई कविता के समानांतर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहा था, जिसका भाव-संज्ञान पारम्परिक गीत के मुक़ाबले अधिक विस्तृत, अधिक सघन और अधिक सक्षम-सम्पन्न था। आज का नवगीत उसी पिछली सदी के छठे दशक के नवगीत की चौथी पीढ़ी का संस्करण है और उसने उन सभी संज्ञानों का संधान किया है, जिनके संबंध में उसकी सक्षमता संदिग्ध मानी गई थी। आज के जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नहीं है, जिसकी अभिव्यक्ति नवगीत में न हो पाई हो। 'गीति कविता ने कविता में विचारों के दरवाजे बंद किये हैं' या इसमें 'सामाजिक उत्तरदायित्व बोध नहीं हैं' जैसे नई कविता के तथाकथित मसीहों के ग़ैरजिम्मेदाराना वक्तव्य कितने अनर्गल हैं, कहने की आवश्यकता नहीं है। अपनी प्रखर मारक कहन से नवगीत ने आज की विसंगतियों एवं छल-छद्म की स्थितियों का जिस शिद्दत से आकलन किया है, उससे इन उत्तरदायित्वहीन वक्तव्यों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।जब तक मानुषी राग-विराग, आस्थाएँ एवं आस्तिकताएँ जीवित हैं, गीतकविता अप्रासंगिक नहीं हो सकती। माँ की ममता जैसी मनुष्य की मूल रागात्मक वृत्तियाँ जब तक शेष रहेंगी, गीत की अस्मिता भी तब तक प्रासंगिक रहेगी। आज के मशीनी, पदार्थिक, भोगपरक जीवन के तनावों और निरर्थकताओं से जब मनुष्य मुक्ति पाना चाहेगा, उसे जीवन की रागात्मकता की खोज करनी ही पड़ेगी और तब गीतकविता ही उसे सहारा और जीने का आधार देगी।

आज के नवगीत का कथ्य वह सब है, जो समग्र जीवन का सरोकार है। आज जो कुछ भी जीवन में है, जो कुछ भी अच्छा-बुरा घटित हो रहा है, वह सब नवगीत के कथ्य की परिधि में आता है। अस्तु, आज नवगीत सही अर्थों में समग्र जीवन का काव्य है।प्रारम्भ में नवगीत का कथ्य आंचलिक और प्रकृतिपरक अधिक था और उसकी भाषा और कहन भी प्रमुख रूप से लोकगीतात्मक थी, किन्तु आज उसके कथ्य के विस्तार के साथ उसकी भाषा, उसका शिल्प भी बहुआयामी हो गये हैं। वैसे तो शुरू से ही नवगीत प्रयोगधर्मी रहा है,हिंदी प्रदेश  किन्तु आज उसमें विभिन्न क्षेत्रीय आलोकों का ऐसा प्रसरण हुआ है कि वह समूचे हिन्दी प्रदेश की भाषागत एवं शिल्पगत विशिष्टताओं को समाहित कर उसका प्रतिनिधि काव्य बन गया है। उसमें आमफ़हम मुहावरेदार भाषा का प्रयोग बढ़ा है। उसके कहन की संवादात्मक मुद्रा आम ज़िन्दगी की मुद्रा है। बिम्बाकृतियों में सहजता आई है। वे अधिक जीवंत, अधिक सरल, अधिक सार्थक और अधिक सटीक हुई हैं। प्रतीक कथन भी, जो प्रारम्भ में नवगीत को दुरूह बनाता था, अब जीवन की आम स्थितियों से जुड़कर सहज-सरल हुआ है। समय के साथ नवगीत के ये आग्रह शिथिल पड़े हैं और वह भाषा, शिल्प, संरचना, सभी दृष्टियों से सहज हुआ है। यही है उसके विकास की दिशा।

जहाँ तक गीत तथा नवगीत में अंतर की बात है, नवगीत गीत तो है ही, किन्तु उसमें और भी बहुत कुछ ऐसा है, जो 'गीत' कही जाने वाली काव्य विधा में नहीं है। यह सच है कि नवगीत गीत से ही उपजा, किन्तु जैसे संतान में माता-पिता के गुणसूत्र होते हुए भी वह उनसे अलग होती है, वैसे ही नवगीत भी गीत से अलग है यानी वह गीत का 'क्लोन' नहीं है। उसकी गीत से निश्चित ही एकदम अलग इयत्ता है। गीत और नवगीत के बीच विवाद की बात अनपेक्षित है। मेरी राय में, ऐसा कोई विवाद है ही नहीं। गीत का अपना एक विधान है, नवगीत का अपना अलग विधान है। दोनों की विचार-पद्धति एवं भाव-संज्ञान में फ़र्क है। दोनों की आकृति में समानताएँ दिख सकती हैं, किन्तु उनमें जो दृष्टिकोण का अंतर है, वही उन्हें स्पष्ट रूप से एक-दूजे से अलगाता है। गीत एवं नवगीत संज्ञाओं के घालमेल से दोनों का अहित होगा। अस्तू, 'गीत को गीत ही रहने दो' जैसे आग्रहों को दोनों के बीच ग्रंथि नहीं बनने देना चाहिए। दोनों का अस्तित्त्व अपनी-अपनी जगह बरक़रार रहे, यही श्रेयस्कर होगा। हाँ, गीत को गीत ही रहने दें और नवगीत को नवगीत ही।

नवगीत गीत के भविष्य का काव्य है। नवगीत की जो प्रखर लोकाग्रही मुद्रा है और उसकी कहन में जो सूक्ष्म किन्तु सहज स्पष्टता एवं पारदर्शिता है, वही भविष्य की गीतकविता की दिशा है। उसे न तो आकाशकुसुम बनने दें और न ही लचर सपाटबयानी। गीत और अधिक सहज होकर हमारी जातीय अस्मिता को परिभाषित करे, फ़िलवक़्त की सही पड़ताल करते हुए सर्वकालिक बना रहकर कालजयी मानुषी आस्थाओं का भी पोषण करता रहे, भाषा के काव्यात्मक अचरज को निरंतर खोजता रहे, तभी वह भविष्य मेंं भी कविता की भूमिका निभा पायेगा।

---- कुमार रवीन्द्र

(प्रकाशितः प्रेसमेन, भोपाल 15 अगस्त 2009)

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